———० खरी-खोटी ०——–

(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
अतीव तीव्र गति में गुरु-शिष्य-सम्बन्ध क्षरण को प्राप्त हो रहा है; कारण के मूल में आन्तरिक और बाह्य परिवेश हैं। अब घर-परिवार के भी सम्बन्ध तिक्त होते जा रहे हैं। शैक्षिक संस्थान के परिसर शैक्षणिक के स्थान पर ‘आवारागर्दी’ के अड्डे होते जा रहे हैं। शिक्षालय-प्रबन्धन-प्रशासन निकम्मा हो चुका है। अध्यापक-समूह का एक बड़ा वर्ग तिकड़मी, धूर्त्त, मक्कार, जाहिल, अड्डेबाज़, कर्त्तव्यविहीन, दुर्व्यसनी, लालची, स्वार्थी, लम्पट, अति महत्त्वाकांक्षी, कुत्सित, गर्हित, बीभत्स चरित्रवाला हो चुका है। इसे विद्यार्थी भी अच्छी तरह से जानता-समझता रहता है। दूसरी ओर, आज के अधिकतर विद्यार्थी अपने कथित गुरुओं के पग-चिह्नों का अनुसरण करते पाये जा रहे हैं। यही कारण है कि आज न तो शिष्य के प्रति गुरु का ‘भाव’ लक्षित हो रहा है और न शिष्य का गुरु के प्रति ‘आज्ञाकारिता’ दिख रही है। ऐसे में, ‘समन्वय-सेतु की स्थापना भला कैसे हो? इस प्रश्न पर संवाद करने की आवश्यकता है, अन्यथा आनेवाले कल में गुरु और शिष्य का सम्बन्ध विक्रेता और क्रेता से अधिक और कुछ नहीं रहेगा और सभी शैक्षिक संस्थान ‘बाज़ार’ का चरित्र ग्रहण कर लेंगे।
आइए! हम इस पर विमर्श करें।
(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, इलाहाबाद; ३ अगस्त, २०१८ ईसवी)