
(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
इसमें कोई सन्देह नहीं कि आपकी माँग पूर्णत: न्यायसंगत है; परन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि आप जनसामान्य का जीवन अस्त-व्यस्त कर दें। इससे एक गम्भीर आपराधिक प्रकरण भी आपके साथ जुड़ सकता है, जिसके कारण आपका न्यायिक पक्ष भी दुर्बल और शिथिल पड़ सकता है, जिससे आप सभी अपने निर्दिष्ट लक्ष्य से भटक जायेंगे। आप अभ्यर्थीगण शासन अथवा किसी की निजी सम्पत्ति की क्षति न करें; जनजीवन को स्वाभाविक गति में चलने दें।
आप सभी को जिस रूप में मानसिक और शारीरिक यातनाएँ दी गयी हैं, उनसे आपके स्वजन-परिजन को भी आघात पहुँचा होगा। उत्तरप्रदेश-शासन के ठीकेदार जनसामान्य के हित में काम न कर, स्वहित में कर रहे हैं और उनकी गुण्डई के सामने हम-आप ठहर नहीं सकते; क्योंकि प्रत्येक प्रकार की शक्ति लेकर वे अपने साथ चलते हैं; परन्तु इसका अर्थ यह कदापि नहीं कि आप सभी ‘हाथ-पर-हाथ’ धरकर बैठ जायें।
हमारा संघर्ष जारी रहेगा, आख़िरी दम तक; परन्तु किसी भी प्रकार के विध्वंसक-हिंसक कृत्य से स्वयं को अलग रखकर। ऐसे में, उत्तरप्रदेश-शासन का पुलिस-तन्त्र आपके अहिंसक आन्दोलन-प्रदर्शन करने पर यदि बर्बरतापूर्ण आचरण करता है तो वह आपको आपके गन्तव्य तक ले जाने में सहायक सिद्ध होगा।
उत्तरप्रदेश-शासन-प्रशासन में ‘गुण्डा-तत्त्वों’ की बहुत बड़ी संख्या है; उन्हें हम अपने ‘प्रत्युत्पन्नमति’ और ‘सामान्य संबोधशक्ति’ से पराजित कर सकते हैं। ऐसे में, एकमात्र विकल्प दिख रहा है; और वह यह कि आपका एक प्रतिनिधि- मण्डल उत्तरप्रदेश के विपक्षी दलों के सभी नेतागण से सम्बन्धित समस्त तथ्यों और साक्ष्यों के साथ मिले और उनसे अपने पक्ष में इस स्थिति में ‘लिखित आश्वासन’ ले ले कि उनका गठबन्धन दल यदि उत्तरप्रदेश की सत्ता में आता है तो सम्बन्धित समस्त अभ्यर्थीगण को सेवा में स्थायी रूप में समायोजित/ विधिवत् नियुक्त करते हुए, विनियोजन के दंश से मुक्त करेगा और इसके लिए अभ्यर्थीगण विपक्षी दलों के गठबन्धन के प्रत्याशियों के पक्ष में सर्वसम्मति से मतदान करेंगे-करायेंगे। आपकी संघर्षयात्रा का परिणाम ‘विजय-पर्व’ के रूप में लक्षित हो, कामना करता हूँ।