दीर्घ काल से ‘आरोपी’ शब्द-प्रयोग का प्रचलन है। यह प्रयोगधर्मिता अब एक ऐसा दृश्य प्रस्तुत करती है, जहाँ एक भेड़ के पीछे अरबों-खरबों की संख्या में भेड़ों का झुण्ड बिना जाने-समझे चला जा रहा है। समाज, शिक्षा, व्यवस्थापिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका, मीडिया इत्यादिक जीवन के समस्त क्षेत्रों में आज विश्व-समुदाय ‘आरोपी’ शब्द का प्रयोग करता आ रहा है, उसे समझकर यही निष्कर्ष प्राप्त होता है कि जनमानस विवेक-स्तर पर रिक्त होता जा रहा है; उसकी विचार और चिन्तन-अनुचिन्तन की शक्ति-सामर्थ्य-संवेदना शुष्क होती जा रही हैं। अनुश्रुति-जनश्रुति में इसे ‘भेड़चाल’ की संज्ञा दी गयी है। यही स्थिति भारतीय लोकतन्त्र की भी है।
अर्थ की दृष्टि से उपर्युक्त दोनों ही शब्द शुद्ध हैं परन्तु प्रयोग-स्तर पर इन शब्दों के अर्थ के साथ न्याय नहीं किया जाता। ऐसा इसलिए कि हमारा सम्पूर्ण विद्वत्-समाज इन दोनों शब्दों का अर्थ जानता ही नहीं क्योंकि यदि यह जानता रहता तो शब्द के साथ बलप्रयोग करनेवालों को सन्मार्ग पर लाने का प्रयास करता; वैश्विक मंचों के माध्यम से अनुपयुक्त और अशुद्ध शब्द- प्रयोगकर्त्ताओं का सकारण विरोध करता। हाँ, सचाई यह है कि हमाम में सारे-के-सारे नंगे दिख रहे हैं और एक-दूसरे की/को देखकर आत्ममुग्ध हो रहे हैं। वे दीर्घकालीन नंगे हैं, इसीलिए उन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
आइए! हम उन नंगों की दुनिया ‘उनको’ सौंपते हुए, उनकी चिन्ता करते हैं, जिन्हें अपने ‘नंगेपन’ रहने का अनुभव हो रहा है; लज्जा आ रही है; वे अपना नंगापन ढँकना चाहते हैं तथा स्वयं सम्यक् वस्त्र धारण कर, समाज को उसके नंगेपन रहने का एहसास कराना चाहते हैं।
अब हम मूल विषय पर आते हैं। ‘आरोपी’ के अर्थ में एक अन्य शब्द भी है, जिसे ‘आरोपक’ कहते हैं। ‘आरोपी’ अथवा ‘आरोपक’ का अर्थ है : आरोप करनेवाला (आरोप लगानेवाला नहीं क्योंकि आरोप किया जाता है, लगाया नहीं जाता।)। ‘आरोपी’ शब्द का प्रयोग ‘अनेक शब्द के लिए एक शब्द-प्रयोग’ के रूप में भी होता है।
‘आरोपी’ शब्द संज्ञा है। इसमें ‘आ’ उपसर्ग लगा हुआ है। यह ‘रुह्’ धातु का शब्द है। ‘आरोपी’ शब्द को बनाने के लिए कई प्रत्ययों का सहारा लिया गया है | इसमें ‘णिच्’, ‘पुक्’ तथा ‘णिनि’ प्रत्यय लगे हुए हैं।
अब विचार करते हैं, ‘आरोपित’ शब्द पर :———-
यह शब्द संस्कृत-भाषा का संज्ञा शब्द है | इसमें भी ‘आ’ उपसर्ग है और ‘रुह्’ धातु का प्रयोग भी। यह शब्द तीन प्रत्ययों के सहयोग से बना हुआ है :— ‘णिच्’, ‘पुक्’ तथा ‘क्त’। अर्थ की दृष्टि से यह शब्द ‘आरोपी’ के पूर्णतः विपरीत है। इसका अर्थ है :— जिसका आरोपण हुआ है; अर्थात् जिस पर आरोप किया गया है। इसका प्रयोग ‘अनेक शब्द के लिए एक शब्द ‘ के अर्थ में भी किया जाता है। आरोपित’ में एक प्रत्यय लगा हुआ है, जिसे ‘भूत कृदन्त्’ कहते हैं। ‘आरोपित’ वह है, जिसे किसी की शिकायत पर पुलिसकर्मी पूछताछ के लिए पकड़ते हैं। सन्देह के आधार पर भी जो गिरिफ़्तार (‘गिरफ़्तार’ शब्द-प्रयोग अशुद्ध है।) किया जाता है, वह भी ‘आरोपित’ कहलाता है।
अब हम जब न्याय की शब्दावली में ‘आरोपी’ और ‘आरोपित’ शब्दों पर विचार करते हैं तब वे दोनों शब्द मुखर रूप में सामने आते हैं :— आरोपी ‘वादी’ (प्रथम पक्ष) और आरोपित ‘प्रतिवादी’ (द्वितीय पक्ष) के रूप में। अरबी भाषा में उन्हें क्रमश: ‘मुद्दई’ और ‘मुद्दआअलैह’ कहा जाता है।
न्याय की दृष्टि से देखें तो हमारे समस्त अधिवक्ता और न्यायाधीशगण ‘आरोपी’ शब्द के साथ बलात्कार करते हैं; बलप्रयोग करते हैं तथा जाने-अनजाने ‘न्याय-प्रक्रिया’ के साथ क्रूर मज़ाक़ भी। यदि कोई सजग ‘आरोपी’ हो तो इस शब्द-प्रयोग को लेकर सम्पूर्ण न्यायालय को कठघरे में खड़ा करके, समग्र न्यायतन्त्र में तूफ़ान ला सकता है।
अशुद्ध और विधि-विरोधी प्रयोग : आरोपी पकड़ा गया।
शुद्ध और विधिसंगत प्रयोग : आरोपित पकड़ा गया।
एक अन्य शुद्ध प्रयोग :——–
आरोपी ने आरोपित को पकड़वाया |
(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, इलाहाबाद ; २७ फरवरी, २०१८ ईसवी)
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