कवि:- मनोज कुमार सामरिया”मनु”
मूल्य:- 225/-
प्रथम संस्करण :- 2017
प्रकाशक:- भाषा सहोदरी दिल्ली
समीक्षक;- राजेश कुमार शर्मा”पुरोहित”
कवि मनोज कुमार सामरिया का प्रथम काव्य संग्रह भाषा सहोदरी से प्रकाशित हुआ। मुखावरण आकर्षक लगा। प्रस्तुत कृति में कवि मनोज सामरिया ने सामाजिक सरोकारों नैतिक मूल्य कर्तव्यनिष्ठा ईमानदारी देशभक्ति त्याग बलिदान जैसे विषयों पर आधारित कविताएँ लिखी है। भाषा सहोदरी के आदरणीय जयकांत जी का मार्गदर्शन मिला। भाषा सहोदरी न केवल बल्कि विदेशों में भी हिन्दी भाषा के प्रचार प्रसार का कार्य कर रही है। नवोदित से लेकर स्थापित कवियों की पुस्तकें प्रकाशित करती आई हैं। ऐसे प्रकाशन से कृति का प्रकाशित होना बडी बात है। इस काव्य कृति में उनसाठ कविताएँ है ।
प्रस्तुत कृति तीन खण्डों में विभाजित की गई हैं। प्रथम खण्ड में दस कविताएँ 6 बाल कविताएँ 4 देशभक्ति की कविताएं प्रकाशित की गई है। पाठक एक बार हाथ मे लेकर पढ़े तो अंत तक पढ़ेगा। रुचिकर कविताएँ अलग अलग रस की है। श्रृंगार की कविताएं, जीवन मूल्यों से जुड़ी कविताएँ, बाल कविताएँ देशभक्ति से ओरप्रोत कविताएँ भावप्रधान व रुचिकर है। आदमी को मिटाने चला है कविता में मनोज जी लिखते हैं-
आदमी क्यों आफ्मी को मिटाने चला है
कुछ हो गई खाने में मिलावट
कुछ आ गई संस्कारों में गिरावट
सजा है जो रक्षा सूत्र कलाई में
वजूद आज उसका मिटाने चला है ।
कविता में संस्कारों के अकाल पड़ने की कवि की चिंता साफ नजर आती है। रिश्तों में गिरावट आई है सचमुच।
हल चलाता जा रे हलधर कविता में सामरिया कहते हैं-
हल चलाता जा है हलधर
जोते जा तू उम्मीदों का गिरवी खेत
ना श्रम बिन्दु झर झर बरसा तू बंजर रेत में ।
किसान की दयनीय दशा का चित्रण करती ये पंक्तियाँ बडी सामयिक हैं। यादों के झरोखे गीत में लिखते हैं-
यादों के दिव्य झरोखें से
जब क्षणिक याद तेरी आई
तत्क्षण प्रिय मेरे अन्तस् में
मद्धिम सी सिहरन लहराई ।
कवि ने उक्त विरह की अग्नि का सजीव चित्रण किया है।
मत बांधों ग्रंथि में वे लिखते हैं:-
मत बांधों ग्रंथि
सूने जीवन मे जीवन मिलने दो
गंधहीन उर बगिया में
थोड़ी सौरभ मिलने दो
जीवन मे प्रसन्नता हो।
ऐसा संदेश देती कविता की पंक्तियाँ बहुत अच्छी लगी। मेरी जरूरत बन गई कविता में सामरिया श्रृंगार को इन पंक्तियों में लिखते हैं:-
जाने कब तेरे दिल के कोने में
मेरी मूरत बन गई
मेरी किस्मत के कोरे पन्नों पर
अनायास ही तेरी मूरत बन गई ।
जब प्रेम प्रगाढ़ होता है तो अनुभूतियां टकराती है।
प्रस्तुत काव्य कृति की भाषा बोधगम्य व रचनाएँ भावप्रधान है।
शिल्प की दृष्टि से रचनाएँ अच्छी बन पड़ी है।
बाल कविता रचना का सफर की कुछ पंक्तियाँ दिल को छू गई-
महकी महकी चल बयार
मम्मी करती हमको प्यार
दिनभर की हम बातें भूलें
सपनों में हम झूला झूलें।
बचपन याद आ जाता है। खेलना कूदना मस्ती करना। स्वछन्द रहना। न कोई चिंता न कोई सुख दुख। बचपन लौटा दे फिर से ईश्वर। इस काव्य संकलन में देशभक्ति कविताएँ बाल कविताएँ सभी उत्कृष्ट है।
मनोज सामरिया जी को बहुत बहुत हार्दिक शुभकामनाएं आपकी काव्य संग्रह की यह कृति आपको नई पहचान दिलाये आप इसी तरह साहित्य सृजन करते रहे। पुनः बधाई।
– राजेश कुमार शर्मा”पुरोहित”
समीक्षक
98 पुरोहित कुटी श्रीराम कॉलोनी
भवानीमंडी जिला झालावाड़
राजस्थान