कुत्तों की ‘जातीय’ पहचान

★ आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

देखो!
थोड़ा नज़दीक आओ।
देखो! उस कुत्ते को
अपनी जाति पहचानता है।
उसके सामने भीड़ है
गँवार कुत्ते से लेकर
अर्द्धशिक्षित-शिक्षित कुत्तों की मण्डली
मन्त्रणा करती आ रही है,
‘रिफ़ाइण्ड हड्डी’ का दरकार है;
क्योंकि उनकी भी अपनी सरकार है।
चटोरी जीभ होठों पर फिरती आ रही है;
पक्ष-विपक्ष चाट रहे, एक-दूसरे के।
दूसरे इलाक़े का भी खड़ा है।
दुम हिलाता बता रहा है, अपनी पहचान।
कुत्तों के इलाक़े मे जाओ
सांकेतिक भाषा का अध्ययन करो;
‘कुत्ते’ ही ‘कुत्तों’ की अस्लीयत जानते हैं।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २८ दिसम्बर, २०२१ ईसवी।)