डॉ० राघवेन्द्र कुमार त्रिपाठी ‘राघव’ (अध्यक्ष ह्यूमन वेलफेयर सोसायटी, हरदोई)
पर्यावरण का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भाग जल और जंगल हैं। जल के बिना जंगल का कोई अस्तित्त्व ही नहीं। मैदानी इलाकों में पर्यावरण के स्वास्थ्य के लिहाज से नदियों की उपयोगिता स्वयंसिद्ध है। अवधक्षेत्र मे एक नदी है ‘सई’। तुलसीदास जी श्रीरामचरितमानस के अयोध्याकाण्ड के अन्त मे लिखते हैं कि ‘सई उतरि गोमती नहाये, चौथे दिवस अवधपुर आये॥’ श्रीराम की वनवासयात्रा में उत्तर प्रदेश की जिन पाँच प्रमुख नदियों का जिक्र है, उनमे से एक है– सई। शेष चार नदियां हैं– गंगा, गोमती, सरयू और मंदाकिनी। मैंने सन् 2009 मे सई-यात्रा के दौरान इस हकीकत को बड़ी बेचैनी के साथ महसूस किया कि सई का समाज आज भी इस कथा का जिक्र कर स्वयं को गौरवान्वित महसूस करता है; किंतु इस कुदरती-गौरवशाली प्रवाह के गौरव को बचाने के लिए विशेष चिंतित नहीं दिखाई देता। समग्र गंगा अभियान के दौरान सई के प्रतिनिधि के रूप मे कार्य करते समय ताज्जुब हुआ कि ज्यादातर आबादी इसके भूगोल तक से परिचित नहीं है।
सई, गोमती की प्रमुख सहायक नदी है। हरदोई जनपद मे भिजवान नाम की एक विशाल झील से निकलकर लखनऊ, उन्नाव, रायबरेली, प्रतापगढ़ होते हुए जौनपुर जिले के जलालपुर नामक स्थान पर राजघाट मे सई 715 किलोमीटर का सफर तय करने के बाद गोमती नदी में समाहित हो जाती है। सरीसृप प्रजाति के जीवों की भांति विषर्पाकार होने के कारण इसका नाम पहले सरि और कालान्तर में अपभ्रंश होकर सई हो गया। सई में दस-दस किलोमीटर लम्बे यू टर्न वाले सैकड़ो घुमाव हैं। इतने कठिन घुमाव तथा घुमावों की इतनी अधिक संख्या उत्तरप्रदेश की और किसी नदी में हो, मैंने नहीं देखी। इन घुमावों के कारण इसमे प्राकृतिक रूप से बड़ी संख्या मे गहरे कुण्डों का निर्माण होना स्वाभाविक है। इन कुण्डो के कारण ही ऊपर प्रवाह और नीचे गहरे तक जल का ठहराव दोनो साथ-साथ बने रहते हैं। कुण्डो मे जल के ठहराव के साथ-साथ तलछट मे दरारें हों, तो भूजल पुनर्भरण के लिए इससे बड़ा वरदान और क्या हो सकता है? लेकिन इन सारी विशेषताओं के बाद भी सदानीरा सई पहले विषैली की गयी और अब ‘बेपानी’ हो गयी है।
सई सचमुच अद्भुत भूगोल किंतु गहरे दुर्भाग्य वाली नदी है। क्या इतने कुण्ड, घुमाव, बीहड़ तथा आरक्षित वनक्षेत्र के रहते कोई नदी सूख सकती है ? अब तो लगभग हर वर्ष सई उद्गम से विलयस्थान तक प्रायः सूख जाती है। मै विगत 15 वर्षों से सई को बचाने की आवाज़ उठाते-उठाते सत्ता व जनता की बेरुखी से हताश हो चला हूँ। पर्यावरण-संरक्षण के प्रयास सामूहिक हों तभी सार्थक हैं, नहीं तो सरकारी पौधारोपण की भाँति सहस्त्र पौधों को कोई एक सौभाग्य से जीवित रह पायेगा। राजनैतिक दुरंगों की तरह तिरंगे की बात न कहकर सबको पर्यावरण के प्रति जागरूक होना होगा और छोटा-छोटा योगदान देना होगा।