शिवत्व की यात्रा : सम्बन्धों का प्राण है धर्म

रात का अंतिम प्रहर था। आकाश में चन्द्रमा अपनी शीतलता बिखेर रहा था। आश्रम के पीछे बहने वाली छोटी-सी धारा से जल की मधुर ध्वनि सुनाई दे रही थी। वृक्षों के बीच से बहती हवा में एक विचित्र शान्ति थी—मानो प्रकृति स्वयं किसी गूढ़ सत्य का ध्यान कर रही हो।

आश्रम के प्रांगण में दीपक की लौ स्थिर थी। उसी दीपक के सामने आचार्य पद्मनाभ ध्यानमग्न बैठे थे। उनके मुख पर ऐसी स्थिरता थी मानो भीतर का समुद्र पूर्णतः शांत हो चुका हो।

सुधांशु धीरे-धीरे वहाँ पहुँचा। उसके मन में कई दिनों से एक प्रश्न उठ रहा था—एक ऐसा प्रश्न जो उसके भीतर की साधना को झकझोर रहा था।कुछ क्षण तक वह मौन खड़ा रहा, फिर धीरे से बोला—“गुरुदेव… क्या मैं एक प्रश्न पूछ सकता हूँ?”

आचार्य ने नेत्र खोले। उनके नेत्रों में करुणा और गहराई का ऐसा मिश्रण था कि किसी भी शिष्य का मन सहज ही खुल जाता।“

पूछो वत्स,” उन्होंने शांत स्वर में कहा। सुधांशु ने थोड़ी देर तक आकाश की ओर देखा, मानो शब्द खोज रहा हो। “गुरुदेव… संसार में हम जिन लोगों से प्रेम करते हैं—माता, पिता, पत्नी, मित्र—क्या वही हमारे जीवन का धर्म नहीं होते?

यदि सम्बन्ध ही हमारे जीवन का केन्द्र हैं, तो फिर आप बार-बार क्यों कहते हैं कि धर्म सम्बन्धों से ऊपर है?”आचार्य कुछ क्षण मौन रहे। फिर उन्होंने धीरे से दीपक की ओर संकेत किया। “वत्स, इस दीपक को देखो।”

सुधांशु ने दीपक की ओर देखा। लौ शांत थी, स्थिर थी।आचार्य बोले—“दीपक में तीन वस्तुएँ होती हैं—मिट्टी का पात्र, तेल और बाती। किन्तु इन तीनों के होते हुए भी यदि अग्नि न हो तो दीपक केवल वस्तुओं का ढेर है। प्रकाश नहीं होगा।”

सुधांशु ध्यान से सुन रहा था। “सम्बन्ध पात्र और बाती की तरह हैं,” आचार्य आगे बोले, “किन्तु धर्म उस अग्नि की तरह है जो उन्हें अर्थ देता है। यदि धर्म न हो, तो सम्बन्ध केवल स्वार्थ, अपेक्षा और मोह के बन्धन बन जाते हैं।”

सुधांशु ने धीमे स्वर में पूछा—“क्या प्रेम भी मोह बन सकता है, गुरुदेव?”आचार्य हल्के से मुस्कराए और बोले “वत्स, प्रेम जब धर्म से जुड़ा होता है तो वह शिव बन जाता है और जब वह केवल स्वार्थ से जुड़ता है तो वह मोह बन जाता है।”

कुछ क्षण तक मौन छाया रहा। फिर आचार्य ने धीरे से कहा—“तुमने शिव और सती की कथा सुनी है?” “हाँ गुरुदेव,” सुधांशु बोला। “शिव सती से अनन्त प्रेम करते थे। किन्तु जब सती ने अपने ही आराध्य राम की मर्यादा पर संशय किया, तब शिव ने उस प्रेम का त्याग कर दिया।”

आचार्य का स्वर अब गम्भीर हो गया था। “सोचो वत्स… यदि शिव चाहते तो सती को क्षमा कर सकते थे। वे महादेव थे। उन्हें कौन रोक सकता था? किन्तु उन्होंने ऐसा नहीं किया।”

सुधांशु ने धीरे से पूछा—“क्यों गुरुदेव?”आचार्य ने गहरी साँस ली। “क्योंकि शिव जानते थे कि यदि धर्म से बड़ा कोई सम्बन्ध हो गया, तो संसार में धर्म की जड़ ही कट जाएगी। इसलिए उन्होंने अपने हृदय के सबसे प्रिय सम्बन्ध का भी त्याग कर दिया।” सुधांशु के भीतर कुछ काँप गया। आचार्य आगे बोले— “यही शिवत्व है वत्स। शिवत्व का अर्थ केवल तप नहीं है, केवल समाधि नहीं है। शिवत्व का अर्थ है—जब धर्म और प्रेम के बीच संघर्ष हो, तब धर्म को चुनने का साहस।”

सुधांशु की आँखें गहरी हो गईं। “तो क्या धर्म के लिए हमें अपने प्रियजनों का भी त्याग करना पड़ सकता है?” आचार्य ने धीरे से कहा—“त्याग करना ही पड़े—यह आवश्यक नहीं। किन्तु यदि परिस्थिति आ जाए, तो त्याग करने की क्षमता अवश्य होनी चाहिए।”

आश्रम के चारों ओर गहरा मौन फैल गया। दूर कहीं उल्लू की आवाज सुनाई दी। आचार्य ने फिर कहा—“राम ने भी यही किया था। उन्होंने राज्य, माता, पिता, पत्नी—सब कुछ धर्म के लिए त्याग दिया। कृष्ण ने भी यही किया। उन्होंने अपने ही कुल के विरुद्ध धर्म की स्थापना के लिए युद्ध का मार्ग चुना।”

सुधांशु का स्वर काँप गया—“गुरुदेव… क्या यही शिवत्व की यात्रा है?” आचार्य ने उसकी ओर गम्भीर दृष्टि से देखा और कहा “हाँ वत्स। शिवत्व की यात्रा वही है जिसमें राम की मर्यादा और कृष्ण की गीता दोनों समाहित हों।” उन्होंने आगे कहा— “राम हमें सिखाते हैं कि जीवन में मर्यादा कैसे रखी जाए और कृष्ण हमें सिखाते हैं कि जब धर्म संकट में हो, तो मोह और सम्बन्धों से ऊपर उठकर सत्य के पक्ष में कैसे खड़े हुआ जाए।”

सुधांशु अब पूरी तरह ध्यानमग्न था। आचार्य बोले—“यही कारण है कि मैंने तुमसे कहा था— गृहस्थ जीवन को हल्का मत समझो। गृहस्थाश्रम ही वह स्थान है जहाँ धर्म और सम्बन्धों की सबसे कठिन परीक्षा होती है।” “कैसी परीक्षा गुरुदेव?”आचार्य ने शांत स्वर में कहा—“जब तुम्हें अपने प्रिय व्यक्ति को गलत रास्ते पर जाते हुए देखकर उसे रोकना पड़े… जब तुम्हें अपने ही परिवार के विरुद्ध सत्य का पक्ष लेना पड़े… जब तुम्हें अपने अहंकार को त्यागकर सम्बन्ध बचाना पड़े…” उन्होंने धीरे से कहा—“वहीं से शिवत्व की यात्रा आरम्भ होती है।”

सुधांशु के भीतर जैसे कोई द्वार खुल रहा था।उसने धीरे से कहा—“गुरुदेव… अब मुझे समझ में आ रहा है कि आपने मुझे जंगल में नहीं, गृहस्थ जीवन में साधना करने के लिए क्यों कहा था।” आचार्य मुस्कराए। “वन में साधना करना सरल है वत्स। वहाँ न कोई तुम्हारा अपमान करता है, न कोई तुम्हारे अहंकार को चुनौती देता है।” फिर उनका स्वर गम्भीर हो गया— “किन्तु गृहस्थ जीवन में हर दिन परीक्षा होती है। वहाँ तुम्हारा धैर्य, प्रेम, त्याग और सत्य—सबकी परीक्षा होती है।”

सुधांशु ने हाथ जोड़ लिए। “गुरुदेव… क्या मैं इस परीक्षा के योग्य बन पाऊँगा?” आचार्य ने उसके सिर पर हाथ रखा। “यदि तुम्हारे भीतर ध्रुव जैसी अटलता, प्रह्लाद जैसा विश्वास और मार्कण्डेय जैसी निष्ठा जाग गई, तो कोई शक्ति तुम्हें रोक नहीं सकती।” फिर उन्होंने धीरे से कहा— “किन्तु वत्स… अभी तुम्हारी सबसे बड़ी परीक्षा शेष है।” सुधांशु ने आश्चर्य से पूछा— “कौन-सी परीक्षा, गुरुदेव?” आचार्य की आँखों में रहस्य चमक उठा।

उन्होंने धीरे से कहा—“तुम्हें उस व्यक्ति का सामना करना होगा… जो तुम्हारे जीवन में सबसे प्रिय है।” सुधांशु चौंक गया।

“कौन?” आचार्य ने उत्तर नहीं दिया। उन्होंने केवल इतना कहा—“जब वह समय आएगा… तब तुम समझ जाओगे।”

आकाश में बादल धीरे-धीरे चन्द्रमा को ढक रहे थे और उसी क्षण सुधांशु को लगा—उसकी साधना की सबसे कठिन परीक्षा अब आरम्भ होने वाली है।