आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
हे ‘अयोध्या के राम’!
हे ‘जय श्रीराम’!
हे ‘राजनीतिक दल-विशेष के आयातीत राम’!
मत भूलो कि “हम भक्तन के भक्त हमारे” का उद्घोष करनेवाले ‘सियाराम’/’सीताराम’ लोकमानस में अंकित हैं। वे ‘एकाकी’ राम नहीं हैं प्रत्युत सियाराम/ सीताराम हैं। उसी सियाराम ने एक कौए-द्वारा ‘अपनी’ सीता के स्तन पर चोंच मारते ही तत्पल उस कौए की आँख फोड़ डाली थी; एक तुम हो, जो ‘तीन प्रकार’ के राम का चोला धारण करते हो। तुम ‘राजनीति-विशेष’ के नेताओं के उल्लुओं को सीधा तो करते ही आ रहे हो, उनकी मर्यादारहित आचरण का समर्थन भी।
भारतभूमि की उस भूभाग (उत्तरप्रदेश) मे, जहाँ तुमने जन्म लिया था वहाँ और जहाँ कथानुसार तुमने वनवास की अवधि मे यात्राएँ की थीं वहाँ और अनेक स्थानो मे जाकर तुमने त्रयलोक को कम्पायमान कर देनेवाले दैत्यों के संहार किये थे, उन सभी स्थानो मे तुम्हारी सीता का प्रतिक्षण अदने से नामर्दों के संरक्षण मे दुर्दान्त तत्त्वों-द्वारा सामूहिक शीलहरण और सृष्टि को लज्जित करनेवाली क्रियाएँ की जा रही हैं और तुम ‘प्रमत्त’, ‘परमुखापेक्षी’, ‘पराश्रित’, ‘पराक्रमहीन’, ‘परजीवी’, ‘पुरुषार्थविहीन’, ‘प्रभावरहित’ ‘पराजित’ पुरुष-सा परिलक्षित होते आ रहे हो।
कहाँ गयी तुम्हारी अप्रतिम वह शासन-पद्धति, जिसके कारण उसे ‘रामराज’ (रामराज्य का प्रयोग अनुपयुक्त है।) की संज्ञा दी गयी थी और जिसका दृष्टान्त कालजयी है?
अरे! तुम तो मर्यादापुरुषोत्तम, अर्थात् चौरासी लाख योनियों मे उत्कृष्ट ‘पुरुष’ कहलाते रहे हो। अब यह बताओ, तुमने इस कल्किकाल मे मार्य्यादिक/मार्यादिक आचरण का कब-कितना पालन किया है, इसका कभी तुमने संज्ञान किया है? (संज्ञान किया जाता है, संज्ञान करें ही शुद्ध प्रयोग है।) जानते हो क्यों?…….. वाह! मौन क्यों हो गये; उत्तर दो? जानता हूँ, तुम्हारे पास इसका कोई उत्तर नहीं है; क्योंकि दुर्योधन का नमक खाकर जिस भाँति आचार्य भीष्म, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य इत्यादिक प्रथम श्रेणी के योद्धा आजीवन उसकी “हाँ में हाँ’ मिलाते रहे और जब कुरुक्षेत्र के समरांगण मे शोणित (रक्त)-प्रवाह होने लगा और जीवनान्त समीप आ चुका था तब उन्हें अपने-अपने ‘पापकर्म’ का बोध हुआ था तब तक प्रसंग पर पूर्ण विराम लग चुका था। समयशिला पर अपराधबोध से ग्रस्त ‘खेद’ की मुद्रा मे मात्र कातर नेत्र पसरे हुए थे। तो अब हे ‘जयश्रीराम’! उत्तर सुनो। तुमने जब से ‘जय सियाराम’/’जय सीताराम’ का रूप-धर्म-गुण का त्याग कर, ‘अत्याचारियों’-‘आततायियों’-‘अनाचारियों’-द्वारा फेंके गये टुकड़़ों को लपक कर उनके पक्ष मे ‘सीतारहित’ ‘जय श्रीराम’ का चोला धारण कर लिया है तब से मै तुम्हारी पराधीन प्रवृत्ति पर तुम्हें मनसा विकृत माला पहनाता आ रहा हूँ।
लोकव्यापी नाद ‘जय सियाराम’ समग्र ब्रह्माण्ड मे निनादित होता आ रहा है; वहाँ किसी भी सम्प्रदाय को महत्तर स्थान नहीं दिया गया है, वहाँ तो सभी समवेत हैं; सभी एकान्वित हैं; एकरूप हैं, एक सूत्र मे गूँथे हुए वैविध्यपूर्ण पुष्पों के माला-सदृश अपने महत्तम स्थान पर, जबकि ‘सीताविहीन’ ‘जय श्रीराम’ उसकी तुलना मे ‘तृणसदृश’ लक्षित हो रहा है। यही कारण है कि जो वस्तुत: लोकव्यापी ‘सियाराम’ अथवा ‘सीताराम’ हैं, उनके सम्मुख तुम अशक्त, निश्शक्त तथा निरीह हो।
स्मरण करो, सीताविहीन (जय) ‘श्रीराम’! कितने वर्षों तक भारत के न्यायालय के कठघरों मे तथाकथित हिन्दुओं-द्वारा तुम्हारे ‘अस्तित्व’ को लेकर तुम पर न जाने कितने प्रश्न-प्रतिप्रश्नो के तीर चलाये जाते रहे; परन्तु तुम ‘किंकर्त्तव्यविमूढ़’ बने रहे। चूँकि तुम्हारे नाम मे ‘राम’ शब्द जुड़ा था, इसलिए ‘सीता जी’ का सम्मान करते हुए ‘लोक-आस्था’ तुम्हारे साथ उमड़ पड़ी, जिसके कारण तुम्हें ‘मुक्ति’ मिली है; किन्तु ‘विमुक्ति’ नहीं। तुम जिन कदर्थ और घातक-पातकपात्रों के पक्ष मे ‘हाँ में हाँ’ मिलाते आ रहे हो, वे तुम्हें स्वहित मे ‘विक्रय-वस्तु’ बनाकर अर्थलाभ करते रहेंगे; तुम ‘कृतज्ञ’ बने रहोगे और ‘असत्-सत्’ का विचार किये बिना उनकी क्रूर, छल तथा प्रवंचना की मनोवृत्ति को पढ़ते हुए भी स्वयं को असहाय-निस्सहाय पाते रहोगे, जबकि तुम्हारी सीता दिनभर में न जाने कितनी बार, उन्हीं-द्वारा पोषित कुकर्मियों की कामवासना से मर-मरकर जीती रहेगी।
अब भी विचार करो– जिनके समर्थन मे तुम खड़े हो, वे कितने छलछद्मी, धूर्त्त, पदलोलुप तथा हिंस्र हैं? अब भी समय है, अभयंकर-प्रलयंकर शंकर-सदृश तृतीय नेत्र खोलो और निष्ठुर-निर्दय आततायियों को भस्म कर डालो, जिससे कि जो तुम्हारे नाम पर सीता का हृदय घायल करते आ रहे हैं, तुम्हें चिर-शान्ति की प्राप्ति हो जाये।
मै इस समय अन्तर्द्वन्द्व को जी रहा हूँ; क्योंकि जब तुम स्वयं को ही इन आतंकियों से पृथक् नहीं कर पा रहे हो तब संग्राम योद्धा के रूप मे कैसे दिखोगे? तुम तो ‘लोकव्यापी’ सीताराम’ को कलंकित करते आ रहे हो। तुम यहाँ मात्र एक निरीह पुरुष’ हो, ‘प्रकृति-विहीन’। प्रकृति अर्थात् ‘शक्ति’ और प्रत्येक पति की शक्ति उसकी ‘पत्नी’ होती है। पुरुष और प्रकृति की सम्पृक्ति होती है तब एक ऐसी ऊर्जा और ऊष्मा उत्पन्न होती है, जो ‘पुरुषार्थ’ को रेखांकित करती है। पत्नीराहित्य पुरुष समाज मे रहते हुए भी स्थायी रूप मे कभी ‘समादृत’ नहीं होता है। उसके द्वारा बलपूर्वक करायी गयीं क्रियाओं की प्रतिक्रियाएँ उसे एक समय ऐसे ‘चक्रव्यूह’ ला फेंकती हैं कि ‘चुल्लूभर पानी’ भी नहीं दिखता।
तुम जितने प्रकार के रूप और चरित्र बदलते रहो, अब भारतीय समाज तुम्हें मात्र एक ‘प्ले ब्वॉय’ और ‘पोस्टर ब्वॉय’ के रूप मे ही देखेगा; क्योंकि तुमने उनसे हाथ मिला लिये हैं, जो “सियाराममय सब जग जानी। करहु प्रनाम जोरि जुग पानी।।” के विरुद्ध अन्यथागामी घोष करते आ रहे हैं।
दिव्य राम ‘सियाराम’/’सीताराम’ हैं और लोकमानस के ‘जय सियाराम’ शाश्वत हैं; चिरन्तन हैं तथा सार्वभौमिक भी।
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १४ जनवरी, २०२४ ईसवी।)