वक़्त के थपेड़े

वक़्त के थपेड़े यहाँ जीना सिखा देते हैं।
वक़्त पर इंसान की पहचान करा देते हैं।
दोग़लों को पहचानना आसान बहुत है।
ज़रूरत के वक़्त ही ये लोग दगा देते हैं।

गद्दारी आजकल रग-रग मे मानो भर गयी।
बेहयाई का है आलम शर्म मानो मर गयी।
हमने की मदद तो अधिकार जमा लेते हैं।
जब ख़ुद करते हैं तो अहसान जता देते हैं।

वक़्त ने इंसानियत को सरेबाज़ार बेचा है।
फ़ायदे मे क़ायदे नहीं होते ये बात बेजा है।
यारी को लोग दोधारी तलवार बना लेते हैं।
यही मोहब्बत के नफ़ा-नुकसान गिना देते हैं।

रचनाकार– राघवेन्द्र कुमार त्रिपाठी ‘राघव’