डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय (भाषाविद्-समीक्षक)

● आज (१५ फ़रवरी) मिर्ज़ा ग़ालिब की पुण्यतिथि है ।
जाने क्यों, असद उल्लाह बेग़ ख़ाँ ‘मिर्ज़ा ‘ग़ालिब’ जैसे ज़हीनी अदीब और बेमिसाल शाइर के साथ ऐेसा कौन-सा वाक़िआ हुआ कि उन्हें कहना पड़ा था, “अगर जन्नत का रास्ता इलाहाबाद से होकर जायेगा तो मैं जहन्नुम में जाना ज़्यादा पसन्द करूँगा।”
यह बात नवम्बर, १८२७ ई० की घटना है, जब वे कानपुर, लखनऊ, बाँदा तथा इलाहाबाद से होकर बनारस के सफ़र पर थे। मिर्ज़ा ग़ालिब ने अपने एक शे’र के ज़रिया मन की भँड़ास निकाल दी थी,”हज़र अज़ फ़ितन ए इलाहाबाद।” इसका आशय है, ख़ुदा मुझे इलाहाबादी खुराफ़ातियों से बचाये। इसी सिक्के का दूसरा पहलू यह है कि इलाहाबाद ने उनकी शेरो-शाइरी का इस्तिक़बाल किया है। उनकी शोहरत को इज़्ज़त बख़्शते हुए, इलाहाबाद में ही उनके नाम पर एक मार्ग का निर्माण कराया गया है, जिसका नाम ‘मिर्ज़ा ग़ालिब रोड’ है। इतना ही नहीं, उसी मार्ग पर स्थित एक अदीबी संस्थान भी है, जिसका नाम ‘दारुल उलूम ग़रीब नवाज़’ है और जिसका शाब्दिक अर्थ है, ‘दीन-दु:खियों पर कृपा करनेवाला विश्वविद्यालय’। बेशक, वह विश्वविद्यालय तो नहीं है, फिर भी वहाँ बच्चों को महज़बी तालीम दी जाती है और शेरो-शाइरी की महफ़िल भी सजती है। बहरहाल, मिर्ज़ा ग़ालिब की स्मृति को हम प्रणाम करते हैं।