● आज (३० मई) ‘हिन्दी-पत्रकारिता दिवस’ है।
आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय (बालसाहित्य-विशेषज्ञ)-

एक समय था, जब बाल-पत्रकारिता की अतीव महत्ता थी; सम्पूर्ण विश्व में बाल-संस्कार को नन्हे-मुन्ने बच्चों में आरोपित करने के लिए समाज की चिन्ता हुआ करती थी। बच्चों के लिए प्रकाशित हिन्दी की समाचारपत्र-पत्रिकाओं में बालजगत् और बालमन से सम्बन्धित समाचार, कथा, कहानी, गीत, पहेली, कार्टून आदिक का समावेश रहा करता था। चार दशकों पहले तक देश में बालपत्रकारिता का साम्राज्य बना रहा; उसके बाद उसका पराभव होने लगा। यही कारण है कि जिस इलाहाबाद से सर्वाधिक संख्या में बाल-समाचारपत्र-पत्रिकाएँ प्रकाशित हुआ करती थीं, वहाँ वर्तमान में एक का भी अस्तित्व नहीं दिख रहा है। समय-प्रवाह ने क्रमिक प्रक्रियान्तर्गत सभी को ऐसा समेटा कि बाल-पत्रकारिता के केन्द्र कहलानेवाले इलाहाबाद में अब ‘शून्यता’ परिलक्षित हो रही है।
इतिहास साक्षी है कि इलाहाबाद से सर्वप्रथम बालपत्रिका ‘विद्यार्थी’ का प्रकाशन १९१४ ई० में हुआ था। रामजी लाल उसके सम्पादक थे।१९१५ ई० में श्रीमती गोपाल देवी के सम्पादन में ‘शिशु’ पत्रिका प्रकाशित हुई थी। ‘इण्डियन प्रेस’ से १९१७ ई० में ‘बाल सखा’ का प्रकाशन हुआ था, जिसके सम्पादक बद्रीनाथ भट्ट थे। १९२७ ई० में ‘हिन्दी प्रेस’ से ‘खिलौना’ पत्रिका प्रकाशित की गयी थी। उसके बाद से बालपत्रिकाएँ प्रकाशित करने का एक अभियान-सा छिड़ गया। ‘कला प्रेस’ से ‘चमचम’ ( १९३१ ई०), ‘हिन्दी मन्दिर’ से ‘बानर’ (१९३७) पत्रिका प्रकाशित हुई थी। आगे चलकर ‘अक्षय भैया’ (१९३४ ई०), ‘तितली’ ( १९४५ई०), ‘बालबोध’, ‘शेर बच्चा’ (१९४७ ई०), ‘लल्ला’ (१९४८ई०), ‘मनमोहन’ (१९४९ई०), ‘विज्ञान जगत्’ (साइंस डाइजेस्ट), ‘जंगल’ (१९६५ ई०), डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय के प्रबन्ध सम्पादन में १९८१ ई० में ‘नन्हे-मुन्नों का अख़बार’ (सम्पादक : अजामिल-प्रदीप सौरभ), ‘बालनगर’ (१९८२ ई०), ‘बालमित्र’ (१९९९; सम्पादक : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय) आदिक बालपत्र-पत्रिकाएँ प्रकाशित होती रहीं और आर्थिक अभाव में समय-शिला पर दम तोड़ती रहीं; किन्तु इतना अवश्य था कि इलाहाबाद की हिन्दी-बाल-पत्रकारिता इतनी संयमित और समृद्ध थी कि उसके प्रभाव से देश में बालसाहित्याकाश में एक-से-बढ़कर-एक तारे आज भी टिमटिमा रहे हैं।
इलाहाबाद से बच्चों के लिए पूर्णत: शैक्षिक पत्रिकाएँ ‘भूगोल’ और ‘इतिहास’ भी प्रकाशित हुई थीं। अधिकतर पत्रिकाएँ सोद्देश्य प्रकाशित होती रहीं, जिनमें बाल-मनोविज्ञान को रेखांकित करनेवाली सामग्री की प्रचुरता हुआ करती थी।
हम यदि बाल-पत्रकारिता के प्रवृत्तिगत चेतना पर चिन्तन करें तो सुस्पष्ट होता है कि एक अन्तराल पर जो भी पत्रिकाएँ प्रकाशित होती रहीं, उनमें परिवर्त्तनशील बालमनोविज्ञान और बालपरिवेश की विषय-सामग्री में वैविध्य रहता था, जो एक कुशल और समय-सत्य सम्पादक के दृष्टिबोध का परिचय देता था। सबसे बड़ी बात, बालपत्रिकाओं का नामकरण ही बच्चों के मन में एक प्रकार की जिज्ञासा और कुतूहल उत्पन्न करता है। इन सभी सन्दर्भों में इलाहाबाद की हिन्दी-बालपत्रकारिता उल्लेखनीय है।
(सर्वाधिकार सुरक्षित — आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ३० मई, २०२० ईसवी)