दिवाकर दत्त त्रिपाठी-
धर्म वह है जिसमें सोचने की जगह हो, विचारों की जगह हो, समय – समय पर उसके सिद्धांतो में लचीलापन लाया जाये और उसकी अच्छाइयों बुराइयों पर स्वस्थ, तार्किक, वैज्ञानिक वाद – विवाद की स्वतंत्रता हो ।
धर्म वह नहीं है, जो लकीर का फकीर हो । जिसमें लचीलेपन की गुंजाइश न हो । जिसमें वक्त के साथ बदलने की क्षमता न हो । अगर ऐसा है तो वह धर्म नही है, पशुता है ,मूर्खता है और वह धर्म मानव समाज एवं स्वयं के लिए समस्या है । शरिया कानून के नाम पर सुप्रीम कोर्ट का विरोध करने वालों ! सिर्फ तलाक देकर चार – चार शादियाँ करना ही लिखा है, तुम्हारी किताबों में । हर जगह शरिया कानून क्यों नहीं लगाते हो ।
- चोरी करने वाले के हाथ कटवाने चाहिए ।
- बलात्कारी को आधा गाड़कर ,पत्थर मार – मार के मार डालना चाहिए ।
- हत्या के अपराधी को चौराहों पर फाँसी दे देनी चाहिए ।
अगर असली मोमिन हो तो इसकी भी वकालत करो । बस तलाक दे – दे कर, नई – नई लड़कियों से शादी करके, उन्हें पाँव की जूती बनाने की वकालत ही क्यों करते हो ।