कहानी ढोंगी बाबा का पार्ट 4 : रूहानी फकीर बाबा

रघुवीर ने काँपते हुए जमील की ओर देखा।

“इसका मतलब?”

जमील ने मजार की तरफ देखा।

“मतलब यह कि शरीफ फकीर कभी था ही नहीं।”

उसी समय गाँव के दूसरी तरफ से एक बच्चा दौड़ता हुआ आया।

“मास्टर जी!”

रघुवीर ने पलटकर देखा।

बच्चा हाँफ रहा था।

“क्या हुआ?”

“नीलम दीदी मिल गईं!”

रघुवीर का चेहरा खिल उठा।

“कहाँ?”

बच्चे ने काँपते हुए कहा—

“मजार के पीछे वाले पुराने कुएँ में।”

रघुवीर के पैर जैसे जमीन में गड़ गए।

जमील ने तुरंत पूछा—

“जिंदा है?”

बच्चे ने सिर हिलाया।

“हाँ।”

सब लोग कुएँ की ओर दौड़े।

नीलम को रस्सी के सहारे ऊपर निकाला गया।

वह बेहोश थी।

उसके कपड़े मिट्टी से सने थे।

कलाई पर गहरी चोट का निशान था।

रघुवीर ने उसे सीने से लगा लिया।

“नीलम!”

कुछ देर बाद उसकी आँखें खुलीं।

उसने सबसे पहले जमील को देखा।

फिर रघुवीर को।

और अंत में उसकी निगाह मजार की तरफ चली गई।

उसके होंठ काँपे।

“वो…”

रघुवीर झुक गया।

“कौन?”

नीलम ने डर से आँखें बंद कर लीं।

“वो फकीर नहीं है।”

भीड़ में सन्नाटा छा गया।

“कौन?”

नीलम ने काँपते हुए कहा—

“शरीफ… वही शरीफ जो अब फकीर बाबा बन गया था। पर था वो कल्लूपुर का आतंकवादी ही।

कल्लूपुर बहुत बड़ा गाँव नहीं था।

चारों तरफ खेत, बीच में कच्ची-पक्की गलियों का जाल, पुराने पीपल और बरगद के पेड़, और गाँव से करीब आधा कोस बाहर एक पुरानी मजार—पीर बाबा की मजार।

मजार के बारे में गाँव में तरह-तरह की बातें कही जाती थीं।

किसी का बच्चा बीमार हो जाए तो लोग कहते, “पीर बाबा की चौखट पर मन्नत माँग लो।”

किसी की शादी में अड़चन हो तो चादर चढ़ती।

किसी के घर औलाद न हो रही हो तो मजार पर धागा बाँधा जाता।

और अगर किसी के घर बेटा पैदा हो जाए तो सबसे पहले मिठाई का डिब्बा मजार पर पहुँचता।

मजार के बारे में सच क्या था, यह शायद किसी को मालूम नहीं था।

लेकिन विश्वास के लिए सच का मालूम होना जरूरी भी तो नहीं होता।

उसी मजार के आसपास धीरे-धीरे एक आदमी का रुतबा बढ़ रहा था।

नाम था—शरीफ मोहम्मद।

नाम शरीफ, मगर चाल-चलन में नाम की एक भी बात नहीं।

गाँव में उसे पहले लोग शरीफवा कहते थे।

लड़ाई-झगड़े से लेकर चोरी-चकारी तक उसका हाथ था। किसी के खेत से फसल गायब हो जाए, किसी की बकरी खुलकर गायब हो जाए, किसी की जेब से पैसे निकल जाएँ—शक की पहली उँगली अक्सर शरीफ की तरफ उठती।

मगर शरीफ इतना शातिर था कि शक कभी सबूत नहीं बन पाता।

और फिर उसकी नजर मजार पर पड़ी।

एक शाम शरीफ मजार की सीढ़ियों पर बैठा बीड़ी पी रहा था।

सूरज डूब रहा था और दूर खेतों के ऊपर धुएँ जैसी धुंध उतर रही थी।

मजार के पास दो औरतें चादर लेकर आईं।

उनमें से एक ने शरीफ को पहचान लिया।

“अरे शरीफ! तू यहाँ?”

शरीफ ने बीड़ी नीचे फेंकी और मुस्कराया।

“काहे? पीर बाबा से मिलने का ठेका तुम्हारे पास है क्या?”

औरत हँस दी।

“तू भी चादर चढ़ाता है?”

“हम तो रोज चढ़ाते हैं।”

“क्या?”

शरीफ ने आँख दबाई।

“अपनी हाजिरी।”

औरतें हँसते हुए अंदर चली गईं।

थोड़ी देर बाद उनमें से एक बाहर आई।

“शरीफ, सुना है तेरी बड़ी दुआ लगती है।”

शरीफ ने गर्दन टेढ़ी की।

“किसने कहा?”

“पिछली बार तुमने कहा था कि अगली बार बेटा होगा। हुआ भी बेटा।”

शरीफ कुछ पल चुप रहा।

फिर उसने धीरे से कहा—

“अबकी बार जब आओगी न, भतीजा भी साथ होगा।”

औरत ने माथा सिकोड़ लिया।

“भतीजा?”

“हाँ।”

“किसका?”

शरीफ ने रहस्यमय अंदाज में आसमान की ओर देखा।

“जिसे आना होगा, वो आएगा।”

औरतें फिर हँस पड़ीं।

शरीफ भी हँसा।

उन्हें क्या मालूम था कि यही छोटी-छोटी बातें कुछ ही वर्षों में उसे गाँव का “फकीर” बना देंगी।

बच्चा पैदा हुआ।

लड़का।

घरवालों ने मिठाई बाँटी।

और किसी ने सबसे पहले जाकर शरीफ के पैर छुए।

“फकीर बाबा की दुआ लग गई।”

उस दिन पहली बार शरीफ ने महसूस किया कि लोगों को ठगने के लिए हमेशा झूठ बोलना जरूरी नहीं होता।

कभी-कभी सामने वाले को वही सुनाना पड़ता है, जो वह सुनना चाहता है।

अगले कुछ महीनों में शरीफ ने अपना रंग बदलना शुरू कर दिया।

बीड़ी गायब।

गाली कम।

सिर पर हरी पगड़ी।

गले में लंबी माला।

हाथ में तस्बीह।

और मजार के बाहर एक पुरानी चटाई।

अब वह वहाँ बैठकर आने-जाने वालों को गौर से देखता।

कौन किस घर से है।

किसके घर में बीमारी है।

किसके घर में झगड़ा है।

किसकी बेटी की शादी की बात चल रही है।

किसके खेत में नुकसान हुआ है।

किसके पति की नौकरी छूट गई है।

वह सुनता कम और जमा ज्यादा करता था।

फिर सही समय पर एक वाक्य बोल देता।

“घर में कोई परेशान है।”

सामने वाला चौंकता।

“हाँ बाबा।”

“परेशानी बड़ी है।”

“हाँ बाबा।”

“मगर घबराने की जरूरत नहीं।”

बस।

इतना सुनते ही सामने वाले का भरोसा पक्का।

शरीफ की असली ताकत उसकी जानकारी थी, मगर गाँव वाले उसे उसकी “करामात” समझते।

धीरे-धीरे उसके पास भीड़ बढ़ने लगी।

किसी को ताबीज चाहिए।

किसी को धागा।

किसी को पानी पर पढ़कर फूँक चाहिए।

और शरीफ हर जरूरत की कीमत जानता था।

वह कभी पैसे सीधे नहीं माँगता।

बस कहता—

“जो दिल करे, चढ़ा देना।”

लोग दिल खोलकर चढ़ाते।

मगर शरीफ की असली कमाई मजार के बाहर नहीं, मजार के पीछे शुरू हुई।

वहाँ एक पुराना नीम का पेड़ था।

उसके आगे टूटी हुई दीवार।

दीवार के पार झाड़ियाँ और फिर सूखी नहर।

दिन में वहाँ कोई नहीं जाता।

रात में तो बिल्कुल नहीं।

शरीफ ने उस जगह को अपना अड्डा बना लिया।

कुछ लोगों ने रात में वहाँ उसकी परछाईं देखी थी।

कभी अकेली।

कभी किसी दूसरे आदमी के साथ।

लेकिन गाँव में फकीर के खिलाफ बोलना आसान नहीं था।

“पीर बाबा की सेवा करता है।”

“रात की इबादत होती होगी।”

“हम लोग क्या जानें?”

ऐसे जवाब मिलते।

एक बार गाँव के मास्टर दीनानाथ ने पंचायत में कहा भी—

“मजार कोई शरीफ की जागीर नहीं है।”

लोग चुप रहे।

शरीफ भी चुप रहा।

सिर्फ मुस्कराया।

उस रात मास्टर दीनानाथ की साइकिल गायब हो गई।

दो दिन बाद साइकिल उनके खेत के पास मिली।

टायर पंक्चर।

सीट फटी हुई।

और हैंडल पर लाल रंग से एक शब्द लिखा था—

चुप।

मास्टर ने वह बात किसी से नहीं कही।

लेकिन उसके बाद उन्होंने मजार की तरफ देखना तक बंद कर दिया।

शरीफ का प्रभाव अब इतना बढ़ गया था कि गाँव में कोई नई घटना हो तो उसका नाम अपने आप उसमें जुड़ जाता।

किसी की शादी तय हुई—फकीर बाबा की दुआ।

किसी का बच्चा ठीक हुआ—फकीर बाबा की दुआ।

किसी का खोया सामान मिल गया—फकीर बाबा की दुआ।

और जब कभी कोई चीज गायब होती, लोग यह मानने को तैयार नहीं थे कि शायद शरीफ का हाथ हो सकता है।

“अरे बाबा आदमी सुधर गया है।”

यही कहा जाता।

लेकिन शरीफ सुधरा नहीं था।

वह सिर्फ समझदार हो गया था।