‘शारदेय’ सुषमा श्रीवास्तव, कानपुर, उत्तर प्रदेशजब-जब रंग बदलता मौसम,
तब तब तुम याद आते हो,
जब जब ठोकर खाती हूँ,
तुम अश्कों में मुस्काते हो।
मौसम की तरह तुम भी बदले,
यह सोच के दिल भर आता है,
दिल काँच के जैसा टूट गया,
हर ख़्वाब मेरा शर्माता है,
जब जब आह निकलती दिल से,
तब तब तुम याद आते हो,
जब जब ठोकर खाती हूँ ,
तुम अश्कों में मुस्काते हो।
तोड़ दी वो उम्मीदें सारी,
जो मैंने तुमसे रखी थीं,
भुला दी वो सारी बातें,
जो कल तक लगती सच्ची थीं,
जब-जब ज़ख्म उभरते दिल के,
तब तब तुम याद आते हो,
जब जब ठोकर खाती हूँ,
तुम अश्कों में मुस्काते हो।
उड़ा दिए अरमान हवा में,
जिन्हें दिल से बाँध के रखा था,
जला दिए वो खत सारे,
जिन में यादों का गुलदस्ता था,
जब जब होती हूँ ग़मगीन,
तब तब तुम याद आते हो,
जब जब ठोकर खाती हूँ,
तुम अश्कों में मुस्काते हो।।