- चाय में अदरक, चीनी, इलायची, लौंग, तुलसीपत्ती जैसे घरेलू सामानों का उपयोग होता है, इसलिए चाय घरेलू है ।
- चाय ‘रामपियारी’ होती है, इसलिए चाय देसी और भक्तिमय है।
- कुल्हड़ वाली चाय पीने से हम देश के विभिन्न भागों की मिट्टी को चूमते हैं , इसलिए चाय पीना देशभक्ति है।
- चाय का कुल्हड़ बनाने वालों के श्रम और कारीगरी को हम चाय पीकर मान और सम्मान देते हैं, इसलिए चाय पीना ‘सर्वहारा वर्ग’ का सम्मान करना है।
- मित्रों के साथ चाय पीने से दोस्ती और मजबूत तथा प्रगाढ़ होती है, इसलिए चाय फ़्रेंडशिप बैंड जैसी है।
- अपनी मनपसंद गोरी के हाथ से चाय पीकर प्यार और परवान चढ़ता है, इसलिए चाय प्रेमियों का सोमरस है।
- घूस लेने वाले बाबू हमेशा ‘चाय-पानी’ के पैसे मांगते हैं, इसलिए चाय को कार्यपालिका का भी प्रश्रय प्राप्त है।
- रात-रात भर जागकर परीक्षाओं की तैयारी करने वाले चाय पीकर ही नींद भगाते हैं, इसलिए चाय प्रतिभागियों का ‘लोकल अभिवावक’ है।
- चाय सस्ती और सुलभ है, इसलिए ‘साम्यवादी’ है।
- हर वर्ग, जाति और धर्म के लोग चाय पीते हैं, इसलिए चाय ‘समाजवादी’ है।
- पुरुषों, महिलाओं में चाय समान रूप से लोकप्रिय है, इसलिए चाय ‘लिंगभेद’ मिटाती है।
- चाय की दुकान चलाने वाला आज देश चला रहा है। इसलिए चाय में ‘अपार संभावनाएं’ हैं।
निष्कर्ष :-
- जो देशी युवा सस्ती, सर्वसुलभ, स्वादयुक्त चाय पीकर अपनी ‘जीवनसाथी’ चुनते हैं, उन्हें जिंदगी भर अपनी ‘धर्मपत्नी’ के हाथ से बनी चाय पीने को मिलती है।
- जो मॉडर्न युवा महंगी, स्वादहीन कॉफी पीकर अपनी ‘would be’ को इम्प्रेस करते हैं, उन्हें जीवनभर अपनी ‘वाइफ’ को बेड पर कॉफी पिलानी पड़ती है।
(आशा विनय सिंह बैस)