शिक्षक दिवस शुभ हो : बंदउं गुरु पद पदुम परागा

राघवेन्द्र कुमार त्रिपाठी ‘राघव’–

शिक्षक दिवस शुभ हो…

बंदउं गुरु पद पदुम परागा। सुरुचि सुबास सरस अनुरागा।।
अमिअ मूरिमय चूरन चारू। समन सकल भव रुज परिवारू॥

(मै गुरुवर के कमल के समान कोमल चरण-धूलि की वंदना करता हूँ। यह पवित्र धूल/रज रुचिकर है अर्थात् प्रेमरस मे पगी है, इसी ने हमारे जीवन को संवारा है। यह धूल सुगंधित है अर्थात् शिष्यों के लिये चन्दन है, इसी को मस्तक पर धारणकर हम व्यक्तित्त्व के विकास को प्राप्त किये हैं। यह चरणो का प्रसाद रसपूर्ण है अर्थात् नौ रसों से भरा है, इसी चरण-रज को पूजकर जीवन रसमय (पूर्ण) हुआ है। गुरुश्रेष्ठ के पग की धूल से हमे अनुराग है, क्योंकि हमारा आकार इसी धूल से है। गुरुदेव के चरणो की यह धूल अत्यन्त हितकर व जीवनी शक्ति देने वाली चूर्णरूप ओषधि है। यह ओषधि दृश्य-अदृश्य व्याधियों का निदान करने वाली है अर्थात् दैहिक, दैविक और भौतिक रोगों का नाश करने वाली परमानन्ददायिनी है।)

आज शिक्षक-दिवस (भौतिक) के पवित्र पर्व पर जीवन के विभिन्न पड़ावों (अध्ययन, चिन्तन, लेखन, वाचन, आचार-विचार आदिक) पर कुछ न कुछ सिखाने वाले प्रत्येक ‘शिक्षक’ के चरणो मे प्रणिपात। शिक्षकवृन्द को शिक्षक दिवस की शुभकामना।