● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
(वैयाकरण एवं भाषाविज्ञानी), प्रयागराज।
तीर्थोँ का राजा प्रयागराज पलक-पाँवड़े बिछाये, देश-देशान्तर से आस्था, श्रद्धा, विश्वास एवं भक्ति का भाव लेकर आनेवाले समस्त तीर्थयात्रियोँ के स्वागत मे प्रतीक्षारत है। यह वही प्रयाग है, जिसकी महत्ता के विषय मे वेद प्रमाण हैँ और पुराण तो सबसे बढ़कर प्रमाण हैँ तथा गंगा-यमुना प्रत्यक्ष प्रमाण हैँ, उस तीर्थराज प्रयाग की जय हो। गोस्वामी तुलसीदास ‘श्री रामचरितमानस’ के माध्यम से कहते हैँ :–
“तीरथपति पुनि देखु प्रयागा। निरखत जन्म कोटि अघ भागा।।”
वस्तुत: प्रयाग-क्षेत्र की महत्ता मनुस्मृति, शताध्यायी, पुराण, श्री रामचरितमानस, आदिकवि वाल्मीकि रामायण, महाभारत, कालिदास-विरचित ‘रघुवंशम्’, विलहण-कृत ‘विक्रमांकदेव’, सुबन्धु-रचित ‘वासवदत्ता’ आदिक ग्रन्थों में उपलब्ध होती है। ‘मत्स्यपुराण’ के अनुसार, प्रयाग-मण्डल का विस्तार २० कोस बताया गया है। ‘कूर्मपुराण’ में कहा गया है कि प्रयाग-क्षेत्र का परिमाप छ: हज़ार धनुष है। इसी पुराण के चौँतीसवें और बयासीवेँ अध्यायोँ मेँ ‘प्रयाग’ नाम से ब्रह्मा के क्षेत्र को पाँच योजन तक विस्तृत बताया गया है। ‘पद्मपुराण’ के ‘स्वर्गखण्ड’ मे प्रयाग के क्षेत्र का पाँच योजन और छ: कोस तक का विस्तार है। इसी पुराण के अट्ठावनवेँ अध्याय मे प्रयाग की लम्बाई-चौड़ाई डेढ़ योजन बतायी गयी है, जिसमे छ: किनारोँ का उल्लेख है। ‘पद्मपुराण’ के ‘पातालखण्ड’ से ज्ञात होता है कि समस्त तीर्थोँ की तुलना मे प्रयाग की महिमा तोल कर आँकी गयी है। समस्त अलौकिक देवी-देवगण के आग्रह पर शेषनाग ने एक तुला पर तोलकर यह निर्णय किया था कि प्रयाग समस्त तीर्थोँ मे सर्वोपरि है।
प्रयाग की व्याकरणिक उत्पत्ति एवं अवधारणा अलौकिक है। प्रयाग मे ‘प्र’ एवं ‘याग’ है। व्याकरणशास्त्र के अनुसार, ‘प्रयाग’ की निष्पत्ति ‘यज्’ धातु से होती है, जिसका अर्थ है, ‘यज्ञ करना’। इस धातु से पूर्व ‘प्र’ उपसर्ग जुड़ा हुआ है, जिसका अर्थ ‘प्रकृष्ट’, ‘श्रेष्ठ’, ‘उत्कृष्ट’ इत्यादिक है। ‘याग’ शब्द यज्ञवाची है; अर्थात् ‘यज्ञ’ का बोध कराता है। इसप्रकार जहाँ उत्कृष्ट कोटि के यज्ञ का निष्पादन हो; यज्ञ सम्पादित किया जाये वा यज्ञ का अनुष्ठान हो, वह ‘प्रयाग’ कहलाता है।
रामायण, महाभारतकाल तथा मुग़ल-बादशाह अकबर के समय के ऐतिहासिक ग्रन्थोँ का अध्ययन करने से ज्ञात होता है कि उत्तरप्रदेश का जो प्रमुख जनपद कल तक ‘इलाहाबाद’ होता था, वह आज ‘प्रयागराज’ हो गया है। जब हम ‘मनुस्मृति’, महर्षि वाल्मीकि-कृत रामायण और वेदव्यास-रचित महाभारत इत्यादिक पौराणिक ग्रन्थोँ पर दृष्टि-निक्षेपण करते हैँ तब विदित होता है कि रामायण-महाभारतकाल के पूर्व और वैदिक काल के पश्चात् ‘प्रयाग’ का नामकरण हुआ था। वेदोँ का काल लगभग ५००० वर्ष ईसा-पूर्व और रामायण-महाभारतकाल लगभग ३००० वर्ष ईसा-पूर्व माना जाता है। इस प्रकार यह स्पष्ट होता है कि प्रयाग का नामकरण ५००० वर्ष ईसा-पश्चात् और ३००० वर्ष ईसा-पूर्व किया गया था। इससे यह सिद्ध होता है कि ‘इलाहाबास’-इलाहाबाद का आरम्भिक आधिकारिक नाम ‘प्रयाग’ था। बहुत कम लोग जानते हैँ कि इसका आरम्भिक ऐतिहासिक नाम ‘इलाहाबास’ था, जो आगे चलकर ‘इलाहाबाद’ हो गया था। यह मुग़ल-बादशाह अकबर की देन है। इतिहास के जो जानकार इलाहाबाद को ‘अल्लाहाबाद’ भी कहते हैँ, वे जनमानस को भ्रमित करते आये हैँ। इलाहाबाद का नाम ‘अल्लाहाबाद’ कभी नहीँ था। रामायण के ‘आदिपर्व’ मे सोम, वरुण तथा प्रजापति नामक देवगण का जन्म प्रयाग मे होने का उल्लेख प्राप्त होता है। महाभारत मे दुर्योधन ने पाण्डवोँ के वनवास के समय उन्हेँ लाख से बनवाये घर मे जलाकर भस्म करने की योजना बनायी थी। उस घर को ‘लाक्षगृह’ कहा गया है, जो प्रयाग मे ही स्थित है। महाभारत के ‘वनपर्व’ के अनुसार, यहीँ पर प्रतिष्ठानपुर (झूसी) हंसप्रपतन, भोगवती, वासुकि (नागवासुकि) दशाश्वमेध (दारागंज), ‘त्रिवेणी संगम’, ‘वेणीमाधव’, ‘सोमेश्वर तीर्थ’, ‘भरद्वाज-आश्रम’ (भारद्वाज-आश्रम’ अशुद्ध है।) तथा ‘अक्षयवट’ नामक मुख्य तीर्थस्थल हैँ। प्रयाग वही महास्थान है, जहाँ शिव, ब्रह्मा, इन्द्र, यम, वरुण, अग्नि, भरद्वाज, अत्रि, अनुसुइया दुर्वासा, मनु, पराशर इत्यादिक देव, विदुषी तथा मुनिगण ने प्रयाग मे यज्ञ किये थे। इनके अतिरिक्त यहाँ के अधिपति ‘अश्वमेध’, ‘वाजपेय’ इत्यादिक यज्ञ करते थे, जिसके कारण इसका नामकरण ‘प्रयाग’ किया गया था। इस प्रयाग शब्द मे ही इसके नाम की सार्थकता दिख रही है। मनुस्मृति’ के अनुसार, “हिमवद्विन्ध्योर्मध्ये, यत्प्राग्विनशनादपि। प्रत्यगेव प्रयागच्च, मध्यदेश: प्रकीर्तित:।।
(हिमालय और विन्ध्यांचल के मध्य उस स्थान से जहाँ सरस्वती विलुप्त हो जाती है और ‘प्रयाग’ के पूर्व जो देश है, उसे ‘मध्यदेश’ कहते है; अर्थात् ‘प्रयाग’ मध्यदेश की पूर्वान्त-सीमा प्रदेश था।) आदिकवि वाल्मीकि रामायण के ‘अयोध्याकाण्ड’ के चौवनवेँ सर्ग मे एक वर्णन है :– राम एक घने वन से निकलकर उस देश (स्थान) मे पहुँचे थे, जहाँ दो नदियो– गंगा-यमुना का संगम था। उसी समय राम ने लक्ष्मण से कहा था– हे सौमित्र! देखो, यही ‘प्रयाग’ है; क्योँकि यहाँ मुनियोँ-द्वारा किये गये ‘अग्निहोत्र’ का सुगन्धित धुआँ उठ रहा है। यहीँ वे ‘भरद्वाज मुनि’ के आश्रम मे ठहरे थे। उसके बाद भरद्वाज मुनि ने प्रयाग से चित्रकूट जाने का मार्ग-प्रशस्त किया था। इतना ही नहीँ, जब भ्राता भरत ने रामचन्द्र, सीता एवं लक्ष्मण को वापस लाने के लिए चित्रकूट के लिए प्रस्थान किया था तब वे सबसे पहले प्रयाग-स्थित भरद्वाज मुनि के आश्रम मे ही पहुँचे थे। प्रयाग मे ही एक ऐसा स्थान है, जो अत्रि मुनि और उनकी पत्नी अनुसूया के नाम के अपभ्रंश से अब ‘अतरसुइया’ हो चुका है।
अब आइए! प्रयाग की ऐतिहासिक महत्ता को समझेँ–
प्रयाग-जनपद का इतिहास हमें ‘बौद्धकाल’ मे प्राप्त होता है। जब चन्द्रगुप्त मौर्य ने समस्त उत्तरभारत पर अपना आधिपत्य कर लिया था तब ‘प्रयाग’ भी उसमे सम्मिलित था। ३१९ ईसा-पूर्व ६४४ ई० मे ह्वेनसांग नामक चीनी यात्री भारत आया था। उसने अपनी दैनन्दिनी (डायरी) मे प्रयाग का नाम अपनी लिपि मे ‘पो-लोये-क्रिया’ लिखा था। उसके अनुसार, प्रयाग नगर मे दो नदियाँ हैँ। प्रयाग दो नदियोँ के मध्य २० ली घेरे में है। ५ ली १ मील के बराबर है। बौद्ध तथा पालि-साहित्य मे ‘प्रयाग तित्थ’ (प्रयाग तीर्थ’) ‘प्रयाग प्रतिट्ठान’ (प्रयाग प्रतिष्ठान’) तथा ‘प्रयाग’ के नाम का उल्लेख है। तथागत गौतम बुद्ध ने अपने उपदेश मे कहा है, “मज्झिम निकाय। वत्थ सुत्तन्त।” (क्या करेगी सुन्दरिका। क्या प्रयाग और क्या बाहुलिका नदी।)
प्रयाग के अस्तित्व को मुग़ल-काल मे भी स्वीकार किया गया था। अकबरकालीन तीन इतिहासकार :– बदायूँनी, अबुल फ़ज़ल तथा निज़ामुद्दीन अहमद ने ‘प्रयाग’ (प्रयाग) नगर के अस्तित्व को स्वीकार करते हुए बताया है कि नवम्बर, १५८३ ई० मे फतेहपुर सीकरी से तीन सौ नौकाओँ का बेड़ा लेकर यमुना नदी से होकर अकबर ‘पयाग’ (प्रयाग) पहुँचा था, जहाँ उसने गंगा-यमुना के संगम-तट पर एक बहुत बड़े क़िले की नीवँ डलवायी थी। अकबरकालीन इतिहासकारोँ की मान्यता है कि अकबर ने गंगा-यमुना के संगम-तट पर जो नगर बसाया था, उसका पुराना नाम ‘पयाग’ (प्रयाग) था। उसे हिन्दू-समुदाय ‘तीर्थराज’ के रूप मे मानता है। अकबर ने प्रयाग का नाम ‘इलाहाबास’ (अल्लाह+बास) = अल्लाह का वास (ईश्वर का वास-स्थान) रखा था। अकबर ने इलाहाबाद के क़िले मे जो सिक्के ढलवाये थे, उन पर ‘इलाहाबास’ उत्कीर्ण है। कोलकाता के संग्रहालय मे ‘इलाहाबास’ नाम से अंकित सोने की दो मोहरेँ अस्सी के दशक मे इस लेख के लेखक को देखने का अवसर मिला था। अकबर के काल मे कुछ ही लोग ‘इलाहाबास’ कहते थे, जबकि अधिकतर लोग ‘इलाहाबाद’ का उच्चारण करते थे। अकबर ने इसे ताड़ लिया और आगे चलकर, उसने ‘इलाहाबास’ का नाम ‘इलाहाबाद’ कर दिया था, तब से जनमानस ने इलाहाबाद को प्रत्येक स्तर पर स्वीकार कर लिया था; और विगत वर्ष मे उत्तरप्रदेश-शासन की ओर से इलाहाबाद से प्रयागराज करने का आदेश प्रसारित कर दिया गया है,जो अब शासनिक रूप ले चुका है।
वर्तमान मे, उसी प्रयागराज मे अब पर्वोँ का संदर्भ भी जुड़ने लगा है। उल्लेखनीय है कि महाकुम्भ की भव्यता पौष-मास की पूर्णिमा-तिथि से समारम्भ होती है; अर्थात् दिनांक १३ जनवरी, २०२५ ई० को प्रात: ५ बजकर ३ मिनट पर यह तिथि लागू हो जायेगी। १४ जनवरी को मकरसंक्रान्ति, २९ जनवरी को मौनी अमावस्या, ३ फरवरी को वसंतपंचमी, १२ फरवरी को माघी पूर्णिमा तथा समापन-पर्व और स्नान के रूप में महाशिवरात्रि है, जिसका आयोजन २६ फरवरी को होगा। इसप्रकार प्रयागराज अपनी पूर्ण सत्ता एवं महत्ता के साथ महाकुम्भ मे छ: तिथियोँ का आयोजन क्रमश: करेगा। तो आइए! ‘प्रयागराज’० चलने के प्रति तत्पर होँ।
सम्पर्क-सूत्र :–
‘सारस्वत सदन’
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