भाषानुशासन के प्रति स्वयं की सजगता आवश्यक
आज (१०) ‘विश्व हिन्दी-दिवस’ और ‘प्रथम विश्व हिन्दी-सम्मेलन’ की स्मृति में ‘सारस्वत भवन’, लूकरगंज, प्रयागराज में एक प्रभावकारी और व्यावहारिक भाषिक और व्याकरणिक विमर्श किया गया, जिसमें बड़ी संख्या में अध्यापक-भाषाकार, साहित्यकार, समीक्षक आदिक की सक्रिय भागीदारी रही।
विशिष्ट अतिथि डॉ० विभुराम मिश्र (समीक्षक-शिक्षाविद्) ने कहा, “भाषा बहता नीर” को स्वीकार करके चलने में भला है; परन्तु शिक्षास्तर पर अशुद्धता को कतई स्वीकार नहीं किया जा सकता।” मुख्य अतिथि डॉ० रामनरेश त्रिपाठी (निदेशक– भारती विद्याभवन) ने कहा, “अब भाषा लुप्त होने का भय है। हम यदि शब्द-शुद्धता के प्रति आत्मचिन्तन नहीं करेंगे तो दूसरों को क्या देंगे?”
अध्यक्ष के रूप में विभूति मिश्र (प्रधानमन्त्री– हिन्दी साहित्य सम्मेलन) ने कहा, “बहुत शान्ति से सोचने पर लगता है कि आज़ादी के समय हमसे कुछ भूल हुई थी, अन्यथा आज हमारे देश में हिन्दी की दुर्दशा नहीं हुई रहती।”
डॉ० अरविन्द मिश्र (समाजशास्त्र– ईश्वरशरण डिग्री कॉलेज) ने कहा, “मेरे पास जो भी विद्यार्थी अशुद्ध आवेदनपत्र, शोधात्मक आलेख आदिक लेकर जब आता है तब मैं टोकता हूँ और शुद्ध करके लाने को कहता है।”
डॉ० कल्पना वर्मा (हिन्दी-विभाग, आर्यकन्या डिग्री कॉलेज) का मत था, “हिन्दी की दुर्दशा हुई है; क्योंकि जब ग़लत तरीक़े से हिन्दी-शब्दों को प्रस्तुत किया जाने लगा था तब किसी ने विरोध तक नहीं किया था।”
डॉ० सुधा त्रिपाठी (हिन्दी-विभाग, इलाहाबाद विश्वविद्यालय) ने बताया, “हमारा पहला उद्देश्य यह होना चाहिए कि हम उन शब्दों को पकड़ें, जिनका अशुद्ध प्रयोग होता आ रहा है और उनका शुद्ध रूप और प्रयोग अपने विद्यार्थियों को बतायें।”
संचालन करते हुए, संयोजक आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने कहा, “अधिकतर पढ़े-लिखे लोग अशुद्ध प्रयोग के स्तर पर समाज को अभिव्यक्ति के स्तर पर रुग्ण कर रहे है। उनमें से जिन्हें मालूम रहता है कि अमुक शब्दप्रयोग शुद्ध और उपयुक्त है, वे ही अशुद्धि के पक्षधर बने हुए हैं।”
प्रो० शिवप्रसाद शुक्ल (हिन्दी-विभाग, इलाहाबाद विश्वविद्यालय) ने कहा, “परिमार्जित भाषा-प्रचलन के लिए नीवँ पर आधारित शिक्षा-पद्धति की व्यवस्था करनी होगी।”
डॉ० राजेश गर्ग (हिन्दी-विभाग, इलाहाबाद विश्वविद्यालय) ने शुद्ध हिन्दी-भाषाप्रयोग के प्रति अपनी असहमति जतायी, जबकि साहित्यकार डॉ० प्रदीप चित्रांशी ने कमज़ोर जड़ को सुदृढ़ करने के प्रति सुशिक्षित समाज का आह्वान किया। डॉ० ज्योतीश्वर मिश्र ने हिन्दी की घटती शुद्धता के प्रति चिन्ता व्यक्त करते हुए शिक्षाजगत् की अबलता पर प्रहार किया था। डॉ० रवि मिश्र (सामाजिक विज्ञान-विभाग, नागरिक पी०जी० कॉलेज, जंघई) ने देशी-विदेशी शब्दों के पारस्परिक साम्य को बताया। उसी पी० जी० कॉलेज में अँगरेज़ी-प्राध्यापक डॉ० विनोद पाण्डेय ने बताया, “मैं अपने विद्यार्थियों को हिन्दीभाषा में ही अँगरेज़ी का अर्थ बताते हुए पढ़ाता हूँ।”
डॉ० प्रतिभा सिंह (अधिवक्त्री– उच्च न्यायालय) ने न्यायालय-स्तर पर हिन्दीभाषा के क्षरण के प्रति चिन्ता व्यक्त की। कुन्तक मिश्र (प्रबन्धमन्त्री– हिन्दी साहित्य सम्मेलन) ने प्राविधिक और प्रौद्योगिकी की शिक्षा के स्तर पर हिन्दीभाषा को अपनाने पर बल दिया था। डॉ० सुधीर त्रिपाठी (जौनपुर) ने बच्चों को अँगरेज़ी के स्थान पर हिन्दी-शब्दों के प्रयोग करने का आह्वान किया। इस अवसर पर ज्योति चित्रांशी, शफ़ी अहमद, स्वतन्त्र पाण्डेय तथा आलोक चतुर्वेदी उपस्थित थे।
हिन्दी साहित्य सम्मेलन की ओर से नववर्ष की दैनन्दिनी (डायरी) भेंट की गयी।
अन्त में, राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्द्धा के प्रधानमन्त्री अनन्तराम त्रिपाठी के १० जनवरी को निधन होने पर उन्हें भावांजलि अर्पित की गयी। संयोजक ने कृतज्ञता ज्ञापित की।