
(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय-
सिद्धान्त-व्यवहार में रेल की दो पटरियों की भाँति दिखनेवाले, आपस में लड़-कटकर मरनेवाले, सामाजिक अन्याय के विरुद्ध चुप रहनेवाले, हर टुकड़े को पाने की आस में जीनेवाले, क़लम बेचकर तमाशा दिखानेवाले, बुद्धि के साथ बल-प्रयोग करनेवाले, अपने कानों को देखे बिना ‘कौए’ के पीछे भागनेवाले, वैचारिक प्रतिक्रिया करने में असमर्थ रहने पर व्यक्तिगत आक्षेप करनेवाले, काग़ज़ आपकी, विचार आपके तथा क़लम हमारा— इसे जीनेवाले, श्रेयकारी सारे कर्म हमारे ही हिस्से में आते रहें—- इसी फ़िराक़ में बने रहनेवाले,निहायत घिनौने, आज के अधिकतर बुद्धिजीवी हैं। इसी का परिणाम है कि आज़ादी के बाद से सत्ताधारी भारतीय समाज में “फूट डालो और राजनीति करो” को चरितार्थ करते आ रहे हैं।