
(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
इक हूक-सी उठी है अब क्या कहूँ तुम्हें?
ज़ख़्मी तन-बदन है अब क्या कहूँ तुम्हें!
हर रात मुझसे रूठी दिन भी उदास है,
क़दम भी बहके-बहके अब क्या कहूँ तुम्हें?
इक अनकही प्यास घेरे हुए है अब,
सागर भी बहुत दूर है अब क्या कहूँ तुम्हें?
ज़ालिम है ज़माना इसका एहसास है मुझे,
एहतियात तो बरतता हूँ अब क्या कहूँ तुम्हें!
(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, इलाहाबाद; ४ जून, २०१८ ईसवी)