निराश और भ्रमित करता केन्द्रीय परिव्यय

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय-

परिव्यय (बजट) किसानों, नौजवानों, बेरोज़गारों, स्वास्थ्य, शिक्षा, पोषण, महँगाई आदिक के लिए कोई ठोस व्यवस्था नहीं है। जो भी सिद्धान्त प्रस्तुत किया गया है और उसके लिए योजना बनायी गयी है, वे क्या हैं और उनका क्रियान्वयन् कैसे किया जायेगा, यहाँ वित्त-वाणिज्यमन्त्री सीतारमण मौन दिखती हैं। इन सभी क्षेत्रों में जनसामान्य को सुविधाओं का लाभ सीधे मिले, इस दिशा में देश का परिव्यय (बजट) असफल सिद्ध होता दिख रहा है। आयकर-व्यवस्था को लेकर पीठ ठोंकी-ठोंकवायी जा रही थी, जो “अपने मुँह मियाँ मिट्ठू” बनना” को चरितार्थ कर रहा है।

लगभग २ घण्टे ४४ मिनट तक का कथित परिव्यय-भाषण यद्यपि ऐतिहासिक रहा है तथापि यह लोकहित की दृष्टि से असफल सिद्ध रहा है। देश की गिरती अर्थव्यवस्था को कैसे सँभाला जायेगा, इस पर देश का परिव्यय मौन है। इस परिव्यय का प्रभाव यह होगा कि लोग निवेश करने से बचेंगे। परिव्यय प्रस्तुत करने से पूर्व आयकर घटाने अथवा बिलकुल समाप्त करने की सम्भावना नज़र आ रही थी; किन्तु आयकर के लिए जो वर्गीकरण किया गया है, वह जन-जन को भ्रमित करनेवाला है। आयकर का जिस तरह से वर्गीकरण किया गया है और विकल्प भी दिये गये हैं, वे भ्रामक प्रतीत हो रहे हैं। २.५ हज़ार की आय पर कोई आयकर नहीं लगेगा। ०-२.५ हज़ार से ५ लाख की आय में ५%; ५ लाख से ७.५ हज़ार तक १०%;. ७.५ से १० लाख रुपये पर १५%; १० लाख से १२.५ हज़ार तक २०%; १२.५ हज़ार से १५ लाख तक २५% तथा १५ लाख से अधिक की आय पर ३०% तक का आयकर लगेगा। नये कर में आर्थिक व्यवस्था कैसे सुदृढ़ हो और देश की महँगाई कम हो, इसके लिए कोई व्यवस्था नहीं की गयी है। निम्न और मध्यम वर्गों के लोग इस परिव्यय से निराश हो सकते हैं। सरकार ‘एअर इण्डिया’ समाप्त करने जा रही है तथा ‘एल०आइ०सी०’ और ‘आइ०डी०बी०आइ०’ में लगे अपने बड़े हिस्से को सरकार बेचेगी, जो कि सरकार के प्रकारान्तर से दिवालिया होने का लक्षण है। सरकार की दोगली नीति को समझें– पहली ओर, सरकार कह रही है कि वह ‘एअर इण्डिया’ को बेचेगी और दूसरी ओर, कह रही है कि किसानों के उत्पादन को हवाई जहाज़ के माध्यम से एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जायेंगे। किसानों के खाद्यान्न प्रतिवर्ष गोदाम के अभाव में सड़ जाते हैं। इसके लिए सरकार ने ‘वेअर हाऊस’ बनाने की बात कही है। इसी सरकार ने पहले भी किसानों की आय दोगुणा करने की बात कही थी; परन्तु वह बुरी तरह से असफल रही है। ऐसे में, प्रश्न है, कहाँ से सुविधा देगी? किस तरीक़े से आय दोगुणी होगी, यहाँ सीतारमण का परिव्यय मौन दिख रहा है। खाद, सिंचाई, बीज, उत्पादन आदिक अब तो लगने लगा है कि वर्तमान सरकार देश बेचने की स्थिति में आ चुकी है। एक प्रश्न और है, और वह यह– जब आयकर-सीमा बढ़ा दी गयी है तब सरकार के राजस्व में वृद्धि कैसे होगी? जूते-चप्पलों पर ‘कस्टम ड्यूटी’ बढ़ाकर जनसामान्य को आर्थिक बोझ से दबा दिया गया है; क्योंकि जूता-चप्पल तो अनिवार्य है। एक बात तो साफ़ हो गयी है कि यह परिव्यय पूरी तरह से बड़े-बड़े उद्योगपतियों के हित में है। सरकार ने ‘सोलर प्लाण्ट’ (सौर संयन्त्र) की बात की है; परन्तु सरकार भूल जाती है कि ‘सौर संयन्त्र’ को लगवाना और उसका उपभोग करना कितना महँगा है।

सामान्य सुविधाएँ लाभकारी हो सकती हैं; किन्तु यह परिव्यय लोकहितकारी नहीं है। बैंक रुग्ण जाता है तो जनसामान्य को मात्र ५ लाख रुपये दिये जायेंगे, जो कि पहले १ लाख रुपये थे।

इस परिव्यय से बाज़ार धड़ाम् हो चुके हैं। अब हम ‘कल’ (२ फ़रवरी) बाज़ार के स्वास्थ्य को समझेंगे।

(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १ फ़रवरी, २०२० ईसवी)