लैंप वाली महिला : आज फ्लोरेेंस नाइटेंगिल की जन्‍मतिथि

1854 में क्रीमियन युद्ध में फ्लोरेंस को “लैंप वाली महिला” (The Lady with a Lamp) का उपनाम द टाइम्स अखबार में छपी इस ख़बर के आधार पर मिल गया; “वह तो साक्षात् देवदूत है। दुर्गन्ध और चीखपुकार से भरे इन अस्थाई अस्पतालों में वह एक दालान से दूसरे दालान में जाती है और हर मरीज की भावमुद्रा उसके प्रति आभार और स्नेह के कारण द्रवित हो जाती है। रात में जब सभी चिकित्सक और स्टाफ़ अपने-अपने कमरों में आराम से सो रहे होते हैं तब वह अपने हाथ में एक लैंप लेकर हर बिस्तर तक जाती है और मरीजों की ज़रूरतों का ध्यान रखती है।”

1840 में इंग्लैंड में भयंकर अकाल पड़ा और अकाल पीडितों की दयनीय, भयावह स्थिति देखकर फ्लोरेन्स बेचैन हो गईं। अपने एक पारिवारिक मित्र डॉ. फाउलर से नर्स बनने की इच्छा प्रकट की तो यह निर्णय सुनकर उनके परिजनों और मित्रों में खलबली मच गई। उनकी माँ को आशंका थी कि उनकी पुत्री किसी डॉक्टर के साथ भाग जायेगी क्योंकि ऐसा उन दिनों अमूमन होता था। इतने प्रबल विरोध के बावज़ूद फ्लोरेंस ने अपना इरादा नहीं बदला। विभिन्न देशों में अस्पतालों की स्थिति के बारे में उन्होंने जानकारी जुटाई और अपने शयनकक्ष में मोमबत्ती जलाकर उसका अध्ययन किया। उनके दृढ़ संकल्प को देखकर उनके माता-पिता को झुकना पड़ा और कैन्सर्वर्थ संस्थान में नर्सिंग की ट्रेनिंग के लिए जाने की अनुमति देनी पड़ी।

1859 में फ्लोरेंस ने सेंट थॉमस अस्पताल में एक नाइटिंगेल प्रशिक्षण विद्यालय की स्थापना की। इसी बीच उन्होंने नोट्स ऑन नर्सिंग पुस्तक लिखी। जीवन का बाकी समय उन्होंने नर्सिग के कार्य को बढ़ाने व इसे आधुनिक रूप देने में बिताया। 1869 में उन्हें महारानी विक्टोरिया ने रॉयल रेड क्रॉस से सम्मानित किया। 90 वर्ष की उम्र में 13 अगस्त, 1910 को उनका निधन हो गया।


आख़िर में अपनी बात


अस्पतालों के प्रबंधन और रोगियों के स्वास्थ्य लाभ में नर्सों का विशेष महत्त्व होता है। आज नर्सों को सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है लेकिन 19वीं शताब्दी के मध्य तक की स्थिति इसके सर्वथा विपरीत थी। नर्स का कार्य बहुत ही निम्न समझा जाता था। निम्न वर्ग की महिलाएं ही इस पेशे में आती थीं। इतिहास बताता है कि उनमें से अधिकांश अनपढ़ और चरित्रहीन होती थीं व नशा किया करती थीं। स्थिति ये थी कि उन्हें अपने कार्य के लिए कोई व्यवस्थित ट्रेनिंग भी नहीं मिलती थी। शायद इसलिए ही फ्लोरेन्स के अभिभावक उन्हें इस पेशे से दूर रखना चाहते थे। लेकिन नियति को तो कुछ और ही मंजूर था न। जब जब धारा के विरुद्ध जाकर निर्णय लिए गए हैं, तब तब इतिहास बना है। आज फ्लोरेन्स के जन्मदिन पर सादर नमन।

 -अंतर्ध्वनि एन इनर वॉइस स्पेशल स्टोरी डेस्क