बन्द हैं जो राज़, उनको अब तो खोलिए

★ आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

होठों को दे ज़बाँ, अजी! कुछ तो बोलिए,
बन्द हैं जो राज़, उनको अब तो खोलिए।
बेहोश थे जब आप, बहुत बोल बोले थे,
बाहोश अब आप, उन शब्दों को तोलिए।
आम खाये नहीं, रह गये गुठलियाँ गिनते?
जो बच गये हैं पल, उन्हें अब तो मोलिए।
ज़िन्दगी मिली ख़ैरात मे, मालूम है बेहतर,
शिक्वा-शिकायत छोड़के, पत्तों-सा डोलिए।
उल्फ़त का तक़ाज़ा है, ज़रा मुड़के देखिए,
हमक़दम यहाँ जवाँ, ज़बाँ अब तो खोलिए।
मासूम थी दीवानगी, कतर दिये क्यों पंख?
उठिए जनाब! दर से, अब न ज़ह्र घोलिए।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ
पाण्डेय, प्रयागराज; २६ जनवरी, २०२२ ईसवी।)