डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय (भाषाविद्-समीक्षक)–
★ दोषियों को कठघरे में लाया जाये ।
८ जनवरी, २०२० ई० को सम्पूर्ण उत्तरप्रदेश में ‘परीक्षा नियामक प्राधिकारी’, प्रयागराज की ओर से प्राथमिक स्तर की जो ‘शिक्षक पात्रता परीक्षा’ का आयोजन किया गया था, उसके ‘हिन्दी-भाग’ में बड़ी संख्या में अशुद्धियाँ हैं, जिनमें प्रश्न और वैकल्पिक उत्तरों में अशुद्धियाँ हैं; समास से सम्बन्धित अशुद्धियाँ हैं; विरामचिह्नों के प्रयोगों में; शब्द-सर्जन, कारक, सन्धि, लिंग-वचन, क्रिया, वर्तनी आदिक से सम्बन्धित बड़ी संख्या में अशुद्धियाँ हैं।

हिन्दी-भाषा का भाग प्रश्न ३१ वें से आरम्भ होता है। यहाँ दिये गये एक गद्यांश के ऊपर एक निर्देश किया गया है, जबकि ‘निर्देश’ शब्द का प्रयोग नहीं किया गया है, जो कि ‘भूल’ है। इसी निर्देशात्मक वाक्य में ही अनेक अशुद्धियाँ हैं। ‘प्रश्न सं. ३२ एवं ३३’ के स्थान पर ‘प्रश्न-सं० ३२ और ३३’ होगा, ऐसा इसलिए कि ‘प्रश्न और सं०’ ‘तत्पुरुष समास का विग्रह है और विग्रह की स्थिति में प्रश्न और संख्या में योजक चिह्न लगता है, फिर ‘सं.’ के स्थान पर संक्षेपसूचक-चिह्न (०) का प्रयोग होगा, इस तरह से– सं०। इसी में ‘एवं’ के स्थान पर ‘३२ और ३३’ होगा; क्योंकि ‘एवं’ का अर्थ ‘और भी’ होता है। इसी गद्यांश के प्रथम वाक्य में ‘तत्व’ के स्थान पर ‘तत्त्व’ होगा, जो कि ‘वर्तनी-दोष’ है। इसी में एक वाक्य में प्रयुक्त ‘जितने भी वाद प्रचलित हैं’ के बाद के वाक्यांश में ‘वह’ के स्थान पर ‘वे’ होगा; क्योंकि इस वाक्य के प्रथम भाग में बहुवचन ‘प्रचलित हैं’, फिर ‘वह’ एकवचन के साथ क्रिया बहुवचन का प्रयोग ‘हो चुके हैं’ अशुद्ध है। इसी गद्यांश के अन्तिम वाक्य में ‘समस्या का हल’ बताया गया है, जबकि यहाँ ‘समस्या का निराकरण’ होता है। इनके अतिरिक्त इस गद्यांश में अनेक सामासिक अशुद्धियाँ हैं। गांधीजी के स्थान पर गांधी जी होगा; क्योंकि उनका उपनाम ‘गांधी’ था, न कि ‘गांधी जी’। ‘जी’ तो एक प्रकार का आदरसूचक शब्द है, जो अलग से है। ३२ वें प्रश्न में ‘बताइये’ के स्थान पर ‘बताइए’ होगा और इस वाक्य के अन्त में ‘पूर्ण विरामचिह्न’ लगेगा। ३३वें प्रश्न के उत्तर के पहले विकल्प में ‘राजनीतिक अध्यात्म’ में ‘राजनीतिक’ के बाद अल्प विरामचिह्न (,) का प्रयोग होगा। तीसरे विकल्प में ‘तत्व’ के स्थान पर ‘तत्त्व’ होगा। ३६वें प्रश्न के उत्तर के पहले विकल्प में ‘कर्तृवाच्य’ के स्थान पर ‘कर्त्तृवाच्य’ होगा। ३७ वाँ प्रश्न रहीम के दोहे पर आधारित है; किन्तु दोहे का उद्धरण करते समय युगल उद्धरणचिह्न ” ” का प्रयोग नहीं किया गया है, जो कि विरामचिह्न-दोष है। इतना ही नहीं, रहीम के दोहे में प्रथम पद में एक पूर्ण विरामचिह्न (।) और अन्तिम पद में दो पूर्ण विरामचिह्न (।।) लगे रहते हैं, इसकी भी उपेक्षा की गयी है। ३९वें में ‘निम्न’ के स्थान पर ‘निम्नलिखित’ होगा। ४०वाँ प्रश्न आपत्तिजनक है; क्योंकि उसका ‘हिन्दी-भाषा’ से कोई सम्बन्ध नहीं है; वह तो ‘शैक्षिक अभियोग्यता’ का प्रश्न है।

४१वें और ४२ वें प्रश्नों के पद्यांश में ‘लला इन’ के स्थान पर ‘ललाइन’ दिया गया है। ४२वें प्रश्न में ‘उपरोक्त’ के स्थान पर ‘उपर्युक्त’ होगा; क्योंकि ‘उपरोक्त’ अशुद्ध शब्द है। ४५वें प्रश्न में दिये गये उदाहरणात्मक वाक्य के अन्त में पूर्ण विरामचिह्न लगेगा; क्योंकि कोई भी वाक्य बिना पूर्ण विरामचिह्न के पूर्ण वाक्य नहीं माना जाता। इसी के विकल्प (३) में ‘पुल्लिंग’ के स्थान पर ‘पुंल्लिंग’ होगा। ४८वें प्रश्न में एक कहावत “छछूँदर के सिर पर चमेली का तेल” दी गयी है और कहावत एक पूर्ण वाक्य है। इसके बाद भी कहावत के अन्त में पूर्ण विरामचिह्न नहीं लगाया गया है। इसका तीसरा विकल्प ही सही उत्तर है; किन्तु कहावत के अनुसार, उपयुक्त उत्तर है– अपात्र/अयोग्य को अच्छी वस्तु की प्राप्ति, जबकि प्रश्नपत्र में उपयुक्त विकल्प है– अयोग्य व्यक्ति को अच्छी चीज देना। यहाँ ‘देना’ शब्द का प्रयोग अनुपयुक्त है। ५०वें से ५२वें तक के प्रश्नों के अन्त में विवरणचिह्न (:/:–) लगेगा और दिये गये अन्तिम विकल्प के अन्त में पूर्ण विरामचिह्न भी।

५३वें प्रश्न में ‘विकल्पों में’ के स्थान पर ‘विकल्पों में से’ होगा। इसके पहले और तीसरे विकल्पों में क्रमश: ‘पूर्णांकबोधक’ और ‘अपूर्णांकबोधक’ होगा और चौथे विकल्प में पूर्ण विरामचिह्न लगेगा। इसी के पहले और दूसरे विकल्पों में क्रमश: ‘सम्बन्धवाचक’ और ‘अनिश्चयवाचक’ होगा। ५५वाँ प्रश्न और उसके सभी विकल्प एक सिरे से भ्रामक, अशुद्ध तथा आपत्तिजनक हैं । इसके अन्तर्गत सन्तान, कढ़ी, चील तथा सरसों में से कौन-सा शब्द पुंंल्लिंग पूछा गया है, जबकि प्रचलित अर्थों में ये सभी शब्द ‘स्त्रीलिंग’ के हैं।
इनके अतिरिक्त बड़ी संख्या में व्याकरणात्मक अशुद्धियाँ हैं। ऐसे में अनेक प्रश्न उत्पन्न होते हैं :– प्रश्नपत्र तैयार करनेवालों के चयन का आधार क्या है? तैयार किये गये प्रश्नों का परीक्षण कौन-कौन करता है और उनकी कार्यशैली क्या है? उत्तरप्रदेश-शासन को इस विषय में गम्भीरता बरतनी होगी, अन्यथा अयोग्य और कुपात्र लोग शिक्षा-परीक्षापद्धतियों को विषाक्त करते रहेंगे।