● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
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आश्चर्य होता है, जब केन्द्र और राज्य की सरकारेँ प्लास्टिक की थैलियोँ पर प्रतिबन्ध की बातेँ करती हैँ; परन्तु उनमेँ भी विभेद करती नज़र आती हैँ। सरकारोँ ने अपनी सुविधा के लिए दो नाम बना लिये हैँ :– ‘गुड प्लास्टिक’ और ‘बैड प्लास्टिक’, जो कि एक प्रकार का छलावा है और उसे ख़ुद को सुरक्षित बनाये रखने की एक निन्दनीय आड़ भी, जहाँ सरकारेँ प्लास्टिक-प्रयोग करने के लिए प्रोत्साह करती हैँ और प्लास्टिक-प्रतिबन्ध करने के लिए पहल भी। सरकारोँ की इन दो तरह की नीतियोँ की चतुर्दिक् भर्त्सना होनी चाहिए। विश्व मे सर्वाधिक प्लास्टिक कचरा पैदा करनेवाले देशोँ मे भारत का चौथा स्थान है; पहले स्थान पर चीन, दूसरे स्थान पर संयुक्त राज्य अमेरिका तथा तीसरे स्थान पर यूरोपीय संघ हैँ।
वर्ष २०१५ में उत्तरप्रदेश की अखिलेश-सरकार ने प्लास्टिक प्रतिबन्धित किया था; परन्तु क्या वह प्रतिबन्ध सफल रहा? बेशक, नहीँ। लघु व्यापारियोँ को परेशान किया जाता था और रिश्वत लेकर जाँच करनेवाले छोड़ दिया करते थे। प्रतिबन्धित करना ही है तो जहाँ से प्लास्टिक का उत्पादन किया जाता है, उन्हेँ पहले प्रतिबन्धित करना होगा।
ग़ौर करने-योग्य है कि उत्तरप्रदेश-सरकार के मुख्यमन्त्री योगी आदित्यनाथ ने भी एक अभियान ज़ोर-शोर से शुरू किया था, जो वर्तमान मे ‘ठण्ढे बस्ते’ मे आराम फर्मा रहा है। उन्होँने जिस गति मे अभियान आरम्भ कर जनसामान्य को त्रस्त कर दिया था, उससे क्या लाभ हुआ है? वे तो यह ही नहीँ बता सके थे कि प्लास्टिक के थैले प्रतिबन्धित हो जायेँगे तो कौन-सा उपयोगी विकल्प लायेँगे। कुछ माह तक कपड़ोँ के बने थैले प्रचलन मे आ गये थे, अब प्लास्टिक के थैले खुले आम व्यवहार मे आ गये हैँ। ऐसे मे, देश के प्रधानमन्त्री से भी प्रश्न करना अधिक उपयुक्त है :– क्या आपके नीति और निर्णय मह्ज़ दिखावे के लिए हैँ? प्लास्टिक के थैली-थैले बनानेवाले कारख़ाने अपना काम कर रहे हैँ और शासकीय फ़रमान ‘त्रिशंकु’ की तरह से लटका हुआ है।
भारत की सबसे बड़ी प्लास्टिक कम्पनी ‘मात्सुई टेक्नॉलाजीज़ इण्डिया लिमिटेड’ है, जो विश्व की सर्वाधिक प्लास्टिक-उत्पादक दस कम्पनियोँ मे से एक है। इसमे इंजेक्शन मोल्डिंग मशीन, ब्लो मोल्डिंग मशीन एक्सट्रूजन मोल्डिंग मशीन और स्ट्रेच ब्लो मोल्डिंग मशीन काम करती हैँ, जो प्लास्टिक प्रसंस्करण-उद्योगोँ के लिए सहायक उपकरण उपलब्ध कराने का कार्य करती हैँ। सरकार यहाँ मौन है।
महाराष्ट्र-शासन ने प्लास्टिक-उपयोग को प्रतिबन्धित किया था; लेकिन पूर्णत: सफल नहीँ रहा है। चौपाटी पहुँच जाइए; समुद्र-किनारे तरह-तरह की ऐसी प्लास्टिक आपको दिख जायेँगी, जिनमे खाद्य और पेय-पदार्थ लिपटाकर फेँके रहते हैँ; उन पदार्थोँ को भरकर उनका पैकेज किया जाता है। देश के समुद्र मे जितना भी कूड़ा-कचरा डाला जाता है, उसका ६० प्रतिशत प्लास्टिक का हिस्सा होता है।
आप किसी रेलगाड़ी, बस इत्यादिक के अन्दर देखिए, क़िस्म-क़िस्म की प्लास्टिक के टूटे-फूटे, कटे-फटे टुकड़े और अवशिष्ट भारी मात्रा मे प्रतिदिन दिखेँगे। प्रश्न है, वे प्लास्टिक कहाँ फेँकी जाती हैँ? राज्य-सरकारेँ अपने-अपने राज्योँ के बड़े नालोँ का सर्वेक्षण करायेँ, जहाँ अत्यन्त घातक रूप मे प्लास्टिक के अवशेष देखे जा सकते हैँ, जो अपशिष्ट रूप मे प्राणिजगत् के स्वास्थ्य के लिए नितान्त घातक सिद्ध हो रहे हैँ।
सुस्पष्ट है, केन्द्र और राज्य की सरकारोँ मे इच्छाशक्ति का पूर्णत: अभाव है, अन्यथा जिस तरह से गुटके, खैनी, तम्बाकू, चॉकलेट, टॉफ़ी, तेल, घी, जल, शराब, दूध, दही, मट्ठा, चावल-दाल, आटा, काजू, किसमिस, बादाम, फल, नमकीन, कुरकुरे आदिक प्लास्टिक के थैले और पैकेट मे भरकर बेचे जाते हैँ, नहीँ बेचे जाते।
सिक्किम-सरकार की सराहना की जानी चाहिए, जिसने वर्ष १९९८ मे भारत मे सबसे पहले पॉलिथिलीन थैले पर पूर्णत: प्रतिबन्ध लागू किया था। सिक्किम मे जब भूस्खलन होता था तब उसके बाद सम्बन्धित विशेषज्ञोँ ने ज्ञात किया था कि पॉलीथिएलीन थैलोँ के अपशिष्ट पदार्थोँ के कारण वहाँ के नाले अवरुद्ध हो जाते थे, जिसके कारण वर्षाजल का निष्कासन नहीँ हो पाता था। इसी के कारण सिक्किम की राज्य-सरकार ने पॉलीथिएलीन थैलोँ और एकल-उपयोग प्लास्टिक पर प्रतिबन्ध लागूकर, अपनी इच्छाशक्ति का अनुकरणीय परिचय दिया था।
प्लास्टिक पर प्रतिबन्ध तो उच्चतम न्यायालय की ओर से कई दशक-पहले से ही लगाया जा चुका है। देश मे अरबोँ लोग-द्वारा जिस मोबाइल फ़ोन का उपयोग किया जाता है, उसमे ख़तरनाक प्लास्टिक की मात्रा बनी रहती है।
हमारे विज्ञानियोँ ने सिद्ध किया है कि किसी प्रकार की प्लास्टिक स्वास्थ्य के लिए नितान्त घातक है। हमे जानना होगा कि प्लास्टिक उच्च आणविक भार से युक्त कार्बनिक बहुलक होते हैँ, जो कार्बन, हाइड्रोजन, नाइट्रोजन, ऑक्सीजन, सल्फ़र और क्लोरीन-जैसे कई तत्त्वोँ से बनाये जाते हैँ। प्लास्टिक के कई उत्पाद ऐसे होते हैँ, जिनमे ‘फथलेट्स’ और ‘फ़्लेम रिटार्डेण्ट्स’-जैसे रसायन होते हैँ, जो विषैले होते हैँ। उनके प्रयोग से जीवधारी का स्वास्थ्य दुष्प्रभावित होता है।
बहुत कम लोग जानते हैँ कि वे जिसका उपयोग खाद्य पैकेजिंग और निर्माण-सामग्री, खेलौने, वैद्युत-सामग्री आदिक मे कर रहे हैँ, उनमे ‘स्टाइरीन’ होता है, जो ‘कैंसर-रोग’ का कारण बनता है। ऐसा इसलिए कि उसमे कैंसरकारी पदार्थ– ‘ल्युकेमिया’ और ‘लिम्फोमा’ होता है। इसप्रकार के प्लास्टिक का निर्माण करते समय उसमे से ‘बेंजीन’ और ‘एथिलबेंजीन’-जैसे पदार्थ निर्गमित होते हैँ, जो विषैले प्रकार के रसायन होते हैँ। टी० ह्वी० हो वा मोबाइल फ़ोन, टैबलेट, इन सबमे कैँसर, मस्तिष्क-प्रभाव, हार्मोन-संकट उत्पन्न करनेवाले अग्निरोधी रासायनिक तत्त्व भी होते हैँ। किसी प्रकार की प्लास्टिक जब जलायी जाती है तब उसके बाहर से केँचुल की तरह से विषैले पदार्थ निकलने लगते हैँ और शरीर के विभिन्न अंगोँ को अपने प्रभाव मे लेने लगते हैँ, जिसका किसी को भान तक नहीँ होता और व्यक्ति मीठी ज़ह्र कि तरह दुष्प्रभावित होता रहता है।
वास्तव मे, जन्म होने से पहले ही शिशु प्लास्टिक के सम्पर्क मे आ जाता है, जिससे उसका शारीरिक और मानसिक विकास अवरुद्ध दिखता है; क्योँकि माँ के गर्भ मे पल रहा भ्रूण हार्मोन को कुप्रभावित करनेवाले रासायनिक तत्त्वोँ की उपस्थिति मे विकास को प्राप्त करता रहता है।
ऐसे लोग की संख्या अत्यधिक है, जो मानते हैँ कि प्लास्टिक को जलाने से उसका दुष्प्रभाव नष्ट हो जाता है; परन्तु वैसे लोग भूल जाते हैँ कि प्लास्टिक जलाने से कई प्रकार की संकटकारिणी गैस निर्गत होती हैँ, जिनमे पॉलीक्लोरिनेटेड बाइफिनाइल्स, पॉलीसाइक्लिक एरोमैटिक हाइड्रोकार्बन, फ़्यूरान और डाइऑक्सिन नामक विषैले रसायन होते हैँ, जो वायुमण्डल मे व्याप्त हो जाते हैँ, जिनके प्रभाव से कैंसर-रोग होता है और प्रजननशक्ति प्रभावित होती रहती है। हमे जानना होगा कि विश्व मे सर्वाधिक सामान्य प्लास्टिक का नाम ‘पॉलीएथिलीन’ है। इसप्रकार की प्लास्टिक मे कार्बन मोनो ऑक्साइड, हाइड्रोजन सल्फ़ाइड, फ़्यूरान और डाइऑक्सिन अत्यन्त घातक रसायन होते हैँ, जिसके जलाने से वे रसायन हवा मे फैल जाते हैँ। उनमे विष की मात्रा अत्यधिक होती है। प्लास्टिक के जलाने से जो सर्वाधिक हानिकारक गैसेँ निकलती हैँ, उनमे शामिल हैँ :– एक्रोलिन, एसीटोन और ब्यूटाडीन।
भारत मे ९७८ प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबन्धन इकाइयाँ हैँ, जिनमे तमिलनाडु मे सर्वाधिक ३२६ हैँ, फिर सर्वाधिक प्लास्टिक-प्रदूषण से ग्रस्त राज्य तमिलनाडु ही है। उसके बाद आन्ध्रप्रदेश मे १३९, बिहार मे १०२ तथा उत्तरप्रदेश मे ६८ हैँ।
सच तो यह है कि केन्द्र और राज्य-सरकारोँ की नीयत और नीति पूर्णत: सन्दिग्ध दिखती है, जिसके अनेक कारण हैँ :–
१– सरकार को चिन्ता नहीँ थी। चुनाव नज़्दीक आते ही उसे ‘प्लास्टिक थैली’ प्रतिबन्धित करने का होश आया था।
२– हर तरह की प्लास्टिक स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिए घातक है। ऐसे मे, प्लास्टिक का ‘गुड प्लास्टिक’ और ‘बैड प्लास्टिक’ के नाम से वर्गीकरण क्योँ?
३– केन्द्र और राज्य की सरकारेँ जिन प्लास्टिक थैली-थैलियोँ मे पैकेज कराकर वस्तुओँ को विक्रय करने के लिए हरी झण्डी दिखाती है, उन थैली-थैलियोँ पर सरकार की मेहरबानी क्योँ?
प्लास्टिक थैली-थैेलोँ पर पूर्णत: प्रतिबन्ध तब लग सकेगा, जब जहाँ से उनका उत्पादन होता है, उस स्रोत को ही अवैध घोषित कर दिया जाये; उसके पंजीयन निरस्त करते हुए, कारख़ाने को ही प्रतिबन्धित कर दिया जाये। इतना होने के बाद भी पूर्णत: प्रतिबन्ध लगने मे एक से दो वर्ष लग सकते हैँ; कारण कि जो प्लास्टिक थैली-थैले समाज के इर्द-गिर्द व्यवहार मे हैँ, वे सम्बन्धित व्यवसायियोँ के पास हैँ। उन्हेँ किसप्रकार से नष्ट किया जा सकेगा; क्योँका उनमे उनकी धनराशि लगी रहती है।
जिस दिन सच्चे अर्थोँ मे सरकार की इच्छाशक्ति और प्रतिबद्धता जाग्रत् होगी, प्लास्टिक के उपयोग शनै:-शनै: प्रक्रियान्तर्गत बन्द होने शुरू हो जायेँगे; परन्तु इसके लिए सत्ता के प्रति आकण्ठ बने मोह का परित्याग कर, लोकहित के प्रति चिन्तन और व्यवहार का चरित्र अपनाना पड़ेगा।
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