भगवान शंकर तो औघड़ थे इसलिए कैलाश पर्वत की हाड़ कंपा देने वाली ठंडी और श्मशान के ताप में भी खुश थे। बाघम्बर उनका वस्त्र था और एक शिला उनका शयन कक्ष। वे वहाँ पर भांग-धतूरा खाकर भी खुश थे।
लेकिन मां पार्वती को लगता था कि अन्य देवताओं की तरह उनके पास भी एक महल होना चाहिए। फिर भगवान शिव तो देवों के देव हैं तो उनके पास सबसे विशाल और भव्य महल होना चाहिए। हालांकि महादेव मना करते रहे कि मेरे पास तो हर तरह के प्राणी आते हैं। मनुष्य से लेकर देवता तक। गंधर्व से लेकर असुर तक तथा ऋषि- मुनि से लेकर भूत प्रेत तक। महल की भव्यता देखकर कहीं वह सकुचा न जाए और मुझसे मिले बिना ही न लौट जाएं।

लेकिन स्त्रियों से कौन जीता है भला?? चाहे वह महादेव ही क्यों न हों? अंततः भगवान शंकर को मां पार्वती की बात माननी ही पड़ी। फिर भगवान विश्वकर्मा को इस महत्वाकांक्षी योजना का भार सौंपा गया। उन्होंने चारों तरफ समुद्र से गिरे और बीच में तीन पर्वत श्रंखला वाले एक स्थान का चुनाव महल बनाने के लिए किया।
उस स्थान पर भगवान विश्वकर्मा ने भव्य महल के साथ ही सोने की नगरी लंका भी बसा दी। ऐसा नगर और महल बनाया कि देखने वाले देखते ही रह गए। मां पार्वती तीनों लोकों से सुंदर इस नगर और महल को देखते ही वहां जाने की जिद करने लगी। महादेव ने कुछ सोचा और बोले-” देवी पहले गृह प्रवेश का अनुष्ठान तो करा लिया जाए। ” देवी मान गई और पूजा के लिए ऋषि विश्रवा (रावण के पिता) को बुलाया गया। उन्होंने विधि विधान से गृह प्रवेश कराया। फिर महादेव बोले-” ब्राह्मण श्रेष्ठ, दक्षिणा में क्या मांगते हो?”
महादेव की माया के प्रभाव से ऋषि विश्रवा की मति कुछ ऐसी हो गई कि वह बोल पड़े -” क्या मैं जो मांगूंगा वह आप दोगे देवाधिदेव?”
मां पार्वती बोली-” ब्राह्मण देवता, आप देवों के देव से कैसा प्रश्न कर रहे हैं? तीनों लोकों में ऐसा क्या है जो महादेव नहीं दे सकते? आपको जो मांगना है मांग लीजिए।”
और ऋषि विश्रवा ने महादेव से पूरी लंका नगरी ही दक्षिणा में मांग ली। वचन से बंधे महादेव और मां पार्वती को ऋषि की इच्छा पूरी करनी पड़ी। भोलेनाथ जो चाहते थे, वही हुआ। लेकिन देवी पार्वती बहुत क्रोधित हुई और उन्होंने ऋषि विश्रवा को श्राप दे दिया-
“तुमने मांगने की मर्यादा का उल्लंघन किया है। अब यह लंका नगरी भी नष्ट होगी और तुम्हारे सारे पुत्र-पौत्र भी”
और कालांतर में ऐसा ही हुआ।
जिस किसी ने भी किसी व्यक्ति, जाति, समुदाय या देश की सदाशयता का लाभ उठाकर मांगने की मर्यादा का उल्लंघन किया उसका सर्वनाश तय है।
(विनय सिंह बैस)