● व्याकरण के स्तर पर अधोलिखित वाक्यों में किस-किस प्रकार की अशुद्धियाँ हैं? उन अशुद्धियों को दूर करते हुए, अधोलिखित वाक्यों को शुद्ध करें―
१- शान्तनु ने स्पृहा से कहा, शान्तनु अब स्पृहा से वार्ता नहीं करेंगे।
२- गुरु की सानिध्य सारे लोग को अर्जित नहीं होता; क्योंकि गुरू भक्ति की प्राप्त अत्यन्त ही कठिन तथा कठोर-साधना है।
उत्तर (सकारण)―
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इन दोनो ही वाक्यों मे प्रयुक्त शब्दों पर यदि सूक्ष्मतापूर्वक दृष्टि-निक्षेपण किया जाये तो एक ‘गम्भीर’ अध्याय का रूप और आकार लेता दिखायी देगा; कभी अवकाश रहा तो हम उस स्तर के दृष्टिबोध को भी रेखांकित करेंगे, इसलिए संक्षेप मे, यहाँ ‘शब्दसंधान’ किया गया है।
इस प्रश्न के अन्तर्गत दो वाक्य दिये गये हैं तथा दोनो ही वाक्य शुद्ध नहीं हैं।
प्रथम वाक्य एक कथन है, जो प्रत्यक्ष कथन का एक उदाहरण भी है; परन्तु उसका वाक्य-विन्यास असंतुलित दिख रहा है। चूँकि वह वाक्य ‘प्रत्यक्ष कथन’ का है, इसलिए उसमे यथोचित संशोधन कर, उसे ‘प्रत्यक्ष कथन’ के रूप मे ही रहने देना चाहिए। जब भी किसी अशुद्ध वाक्य को शुद्ध किया जाता है तब उसमे बहुत परिवर्त्तन नहीं किये जाते। हमारे विद्यार्थी और अध्यापकवृन्द का उद्देश्य होना चाहिए कि जिस प्रकृति का वाक्य है, उसे उसी रूप मे बनाये रखते हुए, उसमे संशोधन करना चाहिए।
आप यदि किसी ‘प्रत्यक्ष कथन’ का ‘परोक्ष कथन’ मे रूपान्तर करते हैं तो आपका उत्तर अनुपयुक्त कहलायेगा।
इसप्रकार ‘प्रत्यक्ष कथन’ के अन्तर्गत प्रथम वाक्य का संशोधित रूप गठित होगा :―
१- शान्तनु ने स्पृहा से कहा, “मै (शान्तनु) अब तुमसे (स्पृहा से) वार्त्ता नहीं करूँगा।”
यदि प्रश्न होता― इस वाक्य को शुद्ध करते हुए, ‘परोक्ष कथन’ (‘अपरोक्ष कथन’ अशुद्ध और अनुपयुक्त है।) मे बदलिए तो आपका उत्तर होता―
◆ शान्तनु ने स्पृहा से कहा कि वह (शान्तनु) अब उससे (स्पृहा से) वार्त्ता नहीं करेगा।
अब द्वितीय वाक्य को देखें।
इसमे ‘सानिध्य’ की वर्तनी/वर्त्तनी/अक्षरी अशुद्ध है। ‘गुरु की सानिध्य’ मे ‘सानिध्य’ पुंल्लिंग का शब्द है, फिर ‘सानिध्य’ के स्थान पर शुद्ध शब्द ‘सान्निध्य’ होगा। ‘सान्निध्य’ का अर्थ है, ‘सामीप्य’ (समीपता), निकटता, नज़्दीकी (फ़ारसी-भाषा का शब्द); ‘नज़दीकी’ अशुद्ध है। ‘सारे लोग’ के स्थान पर ‘सबको’ होगा। यहाँ ‘अर्जित’ का प्रयोग अनुपयुक्त है; क्योंकि कुछ भी ‘अर्जित’ करने के लिए मनुष्य को उद्यम करना पड़ता है, जबकि ‘सान्निध्य’ श्रद्धा, भक्ति तथा समर्पण का विषय है, अत: यहाँ पर ‘अर्जित नहीं होता’ के स्थान पर ‘सुलभ’ (जो प्राप्त हो सकता हो।) नहीं होता’ होगा। इसी वाक्य मे ‘गुरू भक्ति’ निरर्थक शब्द हैं। इन्हें सार्थक करने के लिए ‘गुरू’ की वर्तनी शुद्ध (गुरु) करने के अनन्तर ‘भक्ति’ शब्द को ‘गुरु’ के साथ सामासिक (षष्ठी तत्पुरुष समास) रूप (गुरुभक्ति) देना होगा वा (अथवा) विग्रह (गुरु-भक्ति/गुरु की भक्ति) के रूप मे प्रस्तुत करना होगा। आगे का शब्द ‘भक्त’ शुद्ध तो है; परन्तु इस वाक्य के अन्तर्गत यह अनुपयुक्त है; उपयुक्त प्रयोग ‘गुरुभक्ति/गुरु-भक्ति/गुरु की भक्ति की प्राप्ति’ होगा। आगे के दो शब्दों ‘अत्यन्त ही’ मे से ‘ही’ को हटाना होगा।
‘अत्यन्त’ (अति+अन्त― इ+अ= य― यण् संधि) का अर्थ ‘बहुत अधिक’ है। यहाँ व्यवहृत (व्यवहार किये गये/प्रयोग किये) शब्दों मे ‘अति’ शब्द की उपस्थिति ही पर्याप्त है; क्योंकि ‘अति’ शब्द का अर्थ है, ‘चरम सीमा तक पहुँचा हुआ’, इसीलिए कहा गया है, “अति सर्वत्र वर्जयेत्।” कुछ शब्द देखें :― अतिशय, अतिवाद, अतिरिक्त इत्यादिक। इन शब्दों के शीघ्र बाद ‘ही’ का प्रयोग नहीं किया जाता; क्योंकि ‘ही’ निश्चयार्थक शब्द है, जो ‘बल देने के लिए’ प्रयुक्त होता है, जबकि उपर्युक्त सभी शब्दों मे ‘बलभाव’ सन्निहित है। अब यहाँ एक साथ दिख रहे दो शब्दों :― ‘कठिन’ और ‘कठोर’ मे निहित सूक्ष्म अन्तर को समझें। जो बोधगम्य न हो, वह ‘कठिन’ है। जिसे पूर्ण करने मे विशेष आयास (ऐसा कार्य, जिसे पूर्ण करने मे शरीर थक जाये।), मनोयोग आदिक की आवश्यकता पड़ती है, वह ‘कठोर’ है। इस दृष्टि से ‘साधना’, ‘तपस्या’ इत्यादिक के लिए यहाँ ‘कठोर’ विशेषण-शब्द का सेवन (व्यवहार/प्रयोग) किया जायेगा। ‘कठोर’ और ‘साधना’ के मध्य जो ‘योजकचिह्न’ (-) दिख रहा है, वह औचित्यरहित है; क्योंकि यहाँ ‘कठोर-साधना’ का कोई अर्थ नहीं है। यदि अर्थ निकालेंगे तो ‘कठोर की साधना’, ‘कठोर से सम्बन्धित साधना’ का बोध होगा, जो कि अर्थरहित है। अब यहाँ केवल ‘कठोर साधना’ शुद्ध और उपयुक्त शब्द हैं, जिनके पृथक्-पृथक् अर्थ हैं।
इसप्रकार द्वितीय वाक्य का शुद्ध और उपयुक्त वाक्यविन्यास/वाक्य-विन्यास/वाक्य का विन्यास (वाक्य का सुव्यवस्थित रूप) है―
२- गुरु का सान्निध्य सबको सुलभ नहीं होता; क्योंकि गुरुभक्ति की प्राप्ति अत्यन्त कठोर साधना है।
◆ आचार्य पण्डित पृथ्वीनाथ पाण्डेय की पाठशाला नामक कृति से सकृतज्ञता (साभार) गृहीत (ग्रहण किया गया/लिया गया)।
(सर्वाधिकार सुरक्षित― आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २०२३ ईसवी।)