आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय की पाठशाला

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शब्दविचार
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परम–
१- किसी क्षेत्र में सर्वाधिक उन्नत, सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण।
२- किसी दिशा अथवा सीमा में अग्रसर (सबसे आगे बढ़कर चलनेवाला)।
३- जिसके हाथों में सम्पूर्ण शक्ति हो (शक्तिमान्)
इनके अतिरिक्त मुख्य; आदिम को भी ‘परम’ कहते हैं।
उदाहरण के लिए–
● आपकी परम-आज्ञा (अन्तिम आज्ञा) को टालना किसी के वश में नहीं।
● परम-तत्त्व (‘तत्व’ अशुद्ध है।) का ज्ञानी तो सृष्टिकर्त्ता (‘कर्ता’ अशुद्ध है।)
● परम-सत्ता से बढ़कर कोई सत्ता नहीं।

चरम–
१- किसी भाव/रस की अन्तिम सीमा की स्थिति।
२- जीवन की अन्तिम अवस्था (वृद्धावस्था)।
३- दुर्दान्त कर्तृत्व (‘कृतित्व’ अशुद्ध है।) का स्वामी (चरमपन्थी)।
उदाहरण के लिए–
● मैं आपको ‘चरमपत्र’ सौंप रहा हूँ। (जीवन की अन्तिम अवस्था में लिखा जानेवाला ‘दित्सापत्र’/ ‘वसीयतनामा’)।
● मेरा चरमकाल (मृत्युकाल) आ चुका है।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १३ जुलाई, २०२१ ईसवी।)