आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय की पाठशाला

व्याकरण-बन्धन का समादर करना सीखें– दो
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[२५ नवम्बर, २०२२ ई० से आगे की पाठशाला-सामग्री का अध्ययन-अनुशीलन करें।]

हिन्दी-भाषा निश्चित रूप से क्लिष्ट है; परन्तु उनके लिए जो देवनागरी लिपि और हिन्दी-भाषा को पढ़ने-समझने से कतराते आ रहे हैं। ऐसे विद्यार्थियों का मानना है, हिन्दी तो उनके “बायें हाथ का खेल” (बांये/बाँये, बाँयी अशुद्ध शब्द हैं।) कोई भी भाषा ‘बायें हाथ का खेल’ नहीं होती। इसके लिए साधना करने की आवश्यकता पड़ती है, इसीलिए विद्यार्थि-जीवन को एक तापस (पुंल्लिंग) और तापसी (स्त्रीलिंग) (तापस का अर्थ ‘तपस्वी’ है और तापसी का ‘तपस्विनी’।)-सा माना गया है।

आप अध्यवसाय (उत्साह)-अध्ययन- अनुशीलन (मनन-चिन्तन) अभ्यास के बल पर हिन्दी की लिपि ‘देवनागरी’ और उसकी प्रवाहमयी भाषा की साधना कर, ‘हिन्दीभक्त’/ ‘हिन्दी-भक्त’/ ‘हिन्दी के भक्त (षष्ठी तत्पुरुष समास; सम्बन्धबोधक कारक) हो सकते हैं। जनकवि गोस्वामी तुलसीदास अपने महाकाव्य ‘श्री रामचरितमानस’ (यहाँ ‘रामचरितमानस’ अनुपयुक्त शब्द है।) मे राम से कहलवाते हैं, “हम भक्तन के भक्त हमारे।”

आप यदि ‘सामान्य हिन्दी’ अथवा ‘विशेष हिन्दी’ अथवा ‘हिन्दी-भाषा और संरचना’ अथवा ‘हिन्दी-साहित्य’ वा (अथवा) हिन्दी-माध्यम मे शिक्षण-प्रशिक्षण किये जानेवाले किसी भी विषय की तैयारी (‘तैयारियाँ’ अशुद्ध और अनुपयुक्त शब्द है; क्योंकि ‘अरबी-भाषा’ के शब्द ‘तैयारी’ मे ही समग्रता का भाव है। हिन्दी मे इसे ‘तत्परता’ कहते हैं।) करते हैं तो आपके लिए शुद्ध वर्तनी/अक्षरी का बोध अपरिहार्य (न छोड़ने-योग्य) हो जाता है।

अपनी इस परीक्षोपयोगी (‘परीक्षापयोगी’ अशुद्ध है; क्योंकि ‘परीक्षा+उपयोगी– आ+उ=ओ– गुण स्वर संधि के नियम के अन्तर्गत ‘परीक्षोपयोगी’ होता है।) पाठशाला मे ‘तीन वाक्यों’ :– (१) मैंने जाता हूँ। (२) मैंने तेरे से क्या बोला? (३) यह गाय बड़ा दूध देता है। का उल्लेख किया था। इनमे से प्रथम वाक्य ‘मैंने जाता हूँ।’ पर विशद (सुस्पष्ट) रूप से विचार किया गया था। अब द्वितीय वाक्य ‘मैंने तेरे से क्या बोला?’ को ‘शब्दसंधान’ की कसौटी पर कसा जाये, उससे पहले आप यह भली-भाँति समझ लें कि ‘स्पर्श व्यञ्जनो/ व्यंजनो’ (‘व्यञ्जनों’ और ‘व्यंजनों’ अशुद्ध हैं।) के अन्तर्गत सम्मिलित कण्ठ्य (‘क’-वर्ग), तालव्य (‘च’-वर्ग), मूर्द्धन्य (‘ट’-वर्ग), दन्त्य (‘त’-वर्ग) तथा ओष्ठ्य (‘प’-वर्ग) के पंचमाक्षर (पाँचवाँ अक्षर) पर कभी अनुस्वार (बिन्दी) का प्रयोग नहीं किया जाता। यहीं पर एक प्रश्न उभरता है– यदि किसी ऐसे पंचमाक्षर के उच्चारण करने पर ‘अनुनासिक’ (‘चन्द्रबिन्दु– ँ) के व्यवहार की आवश्यकता पड़े तो फिर किसका व्यवहार करना होगा और क्यों? यह उत्तम प्रश्न है। उदाहरण के लिए– माता के अर्थ मे ‘माँ’ शब्द को देखें। हम यदि ‘माँ’ के स्थान पर ‘मा’ का प्रयोग करेंगे तो उसका उच्चारण ‘नासिका’ से किया जायेगा, फिर ‘ध्वनिविज्ञान’/’ध्वनि-विज्ञान’ के साथ न्याय नहीं होगा; क्योंकि ‘माँ’ का उच्चारण करने के लिए ‘नासिका’ और ‘मुख’ की सहायता ली जायेगी, जिसे ‘अर्द्ध-नासिका’ का प्रयोग कहा जायेगा। इसी तरह का एक अन्य शब्द ‘मुँह’ भी है।

सहस्रों (‘सहस्त्रों’ अशुद्ध है।) वर्षों से ‘अनुस्वार’ और ‘अनुनासिक’ का अशुद्ध प्रयोग किया जाता रहा है और हमारे सभी व्याकरणाचार्य और भाषाविज्ञानी (यहाँ ‘भाषावैज्ञानिक’ अशुद्ध है।) मौन रहे हैं। किसी भी पंचमाक्षर पर अनुस्वार का व्यवहार नहीं होगा; परन्तु इसे अभी तक अशुद्ध लिखाया-पढ़ाया जाता रहा है, जो कि शिक्षण-पद्धति का एक प्रमुख अंग बन चुका है। अब आपको शुद्धता की दृष्टि से बताये गये नियम को धारण करना होगा, जिससे कि इस प्रकार के प्रसंग उपस्थित होने पर आप युक्ति-युक्त तर्क सतथ्य प्रस्तुत कर सकें। चूँकि हमे आरम्भ से ही अशुद्ध अध्यापन कराया गया है, इसलिए हम सभी ने भी अपनी व्याकरणात्मक पुस्तकों मे बिन्दी के प्रयोग किये हैं; परन्तु अब नहीं करेंगे। यहाँ तक कि पंचमाक्षर मे बिन्दी छूट जाती थी तब हमे दण्डित किया जाता था।

अब आप दूसरे अशुद्ध वाक्य को समझें–

दूसरा वाक्य है :–
◆ मैंने तेरे से क्या बोला?

यह वाक्य-प्रयोग किसी समुदाय-विशेष और वर्ग-विशेष के लिए उपयुक्त हो सकता है; परन्तु इसकी सर्वमान्यता नहीं है; क्योंकि समाज-स्तर पर यह वाक्य-व्यवहार शिष्ट नहीं है, इसीलिए इसे ‘अशुद्धि’ की श्रेणी के अन्तर्गत स्थान दिया गया है। यही कारण है कि ‘तेरा’, ‘तेरी’ तथा ‘तेरे’ शब्द-प्रचलन को शब्दानुशासन से बाहर कर दिया गया है। प्रचलन के आधार पर शब्दभेद के विचार से यह ‘सम्बन्धबोधक सर्वनाम’ का शब्द है, जो ‘मध्यम पुरुष’ के अन्तर्गत आता है। इसे ‘तू’ का ‘सम्बन्ध कारक’ कहा गया है। इस ‘तेरे’ के स्थान पर हम ‘तुझे’ को भी स्थान नहीं दे सकते; क्योंकि यह भी ‘तू’ का ‘कर्म’ और ‘सम्प्रदान’ कारक का रूप है। इस प्रकार जब प्रश्नपत्र मे ‘तुझ’, ‘तुझसे’ तथा ‘तुझे’ के प्रयोगवाले वाक्यों को शुद्ध करने के लिए कहा जाये तब आप क्रमश: ‘तुम’, ‘तुमसे’ तथा ‘तुम्हें’ का ही व्यवहार करें; साथ ही शुद्ध और उपयुक्त क्रिया का प्रयोग करें।

उपर्युक्त वाक्य व्याकरण के नियमों से मेल नहीं खाता। शुद्धता की दृष्टि से ‘मेरे-तेरे’ का प्रयोग नहीं होता। यहाँ ‘तेरे’ सर्वनाम- शब्द’ तुमसे’ का बोध कराता है, अत: ‘तेरे’ के स्थान पर ‘तुमसे’ हो जायेगा। ‘क्या बोला?’ के स्थान पर शुद्ध और उपयुक्त शब्द ‘क्या कहा?’ होगा। यहाँ आप सभी के लिए जानना आवश्यक है कि ‘बोलना’ क्रिया मे बुद्धिसम्मत भाव नहीं है; क्योंकि बिना सोचे-समझे कुछ भी उच्चारण कर देना, ‘बोलने’ की श्रेणी मे आता है; वही उच्चारण यदि सुविचारित ढंग से किया जाये तो वह ‘कहना’ कोटि के अन्तर्गत रेखांकित होगा। इस प्रकार शुद्ध वाक्य की रचना होती है :–

◆ मैने तुमसे क्या कहा?

आत्मसात करें :–
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★ मातृभाषा हिन्दी का यथोचित समादर करना सीखें।
★ हिन्दी-माध्यम मे (‘से’ का प्रयोग अशुद्ध है।) परीक्षा-हेतु (के लिए) तत्परता (तैयारी) के लिए देवनागरी लिपि का समुचित ज्ञान अनिवार्य है।
★ शब्द-वर्तनी (अक्षरी) की शुद्धतापूर्वक (‘पूर्वक’ का अर्थ ‘के साथ’/’से युक्त’ होता है।) समझ आवश्यक है।
★ किसी वाक्य मे कर्त्ता और क्रिया का प्रयोग शुद्ध है अथवा अशुद्ध, इनका परीक्षण करने की योग्यता विद्यार्थियों मे होनी चाहिए।

★ अशुद्ध शब्द और वाक्य-प्रयोग करने से अर्थ और भाव-सौन्दर्य नष्ट हो जाता है।

(क्रमश:)
■ ‘आचार्य पण्डित पृथ्वीनाथ पाण्डेय की पाठशाला’ नामक प्रकाशनाधीन पुस्तक से सकृतज्ञता गृहीत।
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १ दिसम्बर, २०२२ ईसवी।)