व्याकरण-बन्धन का समादर करना सीखें– एक
आत्मीय विद्यार्थिवृन्द! (‘विद्यार्थीवृन्द’ अशुद्ध है।)
‘सामान्य हिन्दी’ अथवा ‘हिन्दी-भाषा’, ‘हिन्दी-साहित्य’ तथा अन्य किसी भी विषय के प्रश्नपत्रों मे (‘में’ अशुद्ध है।) अंकित प्रश्नों के उत्तरों को लिखते समय आप यदि शुद्ध और उपयुक्त शब्द-प्रयोग तथा सन्तुलित वाक्य-विन्यास कर, अपनी लेखन-शैली का परिचय प्रस्तुत करते हैं तो परीक्षक आपके उत्तर देने की कला से प्रभावित होकर, आपको अधिकतम अंक प्रदान करने के लिए विवश हो जायेगा। दूसरी ओर, आप जब सामान्य हिन्दी अथवा हिन्दी-भाषा के प्रश्नपत्रों मे पूछे गये सारांश, संक्षेपण, अपठित-अवतरण से सम्बन्धित अपना स्वतन्त्र वाक्य-गठन कर उत्तर लिखते हैं तब कहाँ पर कर्त्ता (‘कर्ता’ शब्द अशुद्ध है।) का प्रयोग होगा तथा कहाँ पर कर्म, क्रिया तथा पूरक शब्द व्यवहार में लाये जायेंगे, इनके प्रति आपको अत्यन्त सजग रहना होगा, अन्यथा आपको इसका ‘ऋणात्मक’ भुगतान करना पड़ सकता है। यही कारण है कि जो गम्भीर और मेधावी विद्यार्थी होते हैं, वे अनेक कोणो (‘कोणों’ अशुद्ध है; क्योंकि पंचमाक्षर नासिका से उच्चरित होता है, जो अनुस्वार-युक्त होता है।) से शब्द-विचार के प्रति सचेष्ट, सजग, सतर्क तथा सावधान रहते हैं। यह एक जागरूक विद्यार्थी का गुण होता है।
प्राय: हमारे विद्यार्थी भ्रमित और शंकित रहते हैं कि प्रश्नपत्र मे किसी वाक्य मे यदि एक साथ दो भिन्न लिंगवाले कर्त्ता दिये हों तो उनकी क्रिया किस रूप मे लिखी जायेगी। निस्सन्देह, यह कठिनाई विद्यार्थियों तक ही सीमित नहीं है, प्रत्युत देश के बहुसंख्य गण्यमान्य अध्यापकवृन्द (‘गणमान्य’ और ‘गण्यमान’ शब्द अशुद्ध हैं; क्योंकि जिसकी गणना की जाये, वह ‘गण्य’ (गणना करने-योग्य) और जिसका मान (आदर) किया जाये, वह ‘मान्य’ (मानने-योग्य) कहलाता है, इस प्रकार ‘गण्यमान्य’ शब्द शुद्ध है।) और विद्वज्जन (‘विद्वत्जन’ अशुद्ध है।) के लिए भी इसका बोध कर पाना, सहज नहीं रहता। इनके अतिरिक्त अन्य कारणो (‘कारणो’ अशुद्ध है।) से शब्दों के प्रति शुद्धता और शुचिता का दृष्टिबोध जाग्रत् (‘जागृत’ और ‘जाग्रत’ अशुद्ध हैं।) करना, प्रत्येक विद्यार्थी का परम (‘परम्’ अशुद्ध है।) कर्त्तव्य बन जाता है।
अब, आप नीचे दिये गये कतिपय अशुद्ध शब्द-प्रयोगों को समझें, जो शब्दानुशासन की दृष्टि से अशुद्ध हैं :–
१- मैने जाता हूँ।
२- मैने तेरे से क्या बोला?
३- यह गाय बड़ा दूध देता है।
इन तीनो (‘तीनों’ अशुद्ध है।) वाक्यों मे अनुचित शब्दों के प्रयोग से वाक्य-विन्यास अशुद्ध होता दिखता है। यहाँ भी ऐसे वाक्यों को सुनकर हमारी हँसी फूट पड़ती है। इसका मुख्य कारण है कि इस तरह के वाक्य को व्यवहार मे लानेवाले लोग ‘व्याकरण’ नहीं जानते।
अब, हम एक-एक कर प्रत्येक वाक्य-प्रयोग को शुद्ध करते हैं। पहला वाक्य है :–
◆ मैने जाता हूँ।
इसमें ‘मैने’ कर्त्ता है और ‘जाता हूँ।’ क्रिया। आपको जानना होगा कि ‘मैने’ के साथ ‘जाता हूँ’, ‘आता हूँ’, ‘खाता हूँ’ इत्यादिक के प्रयोग नहीं किये जाते। ‘मैने’ के साथ ‘खाया’, ‘पिया’, ‘दिया’, ‘लिया’, ‘पूछा’, ‘बताया’ इत्यादिक के प्रयोग शुद्ध हैं। यदि ‘खाता हूँ’ क्रिया के पहले किसी ‘कर्त्ता’ को लगाकर वाक्य बनाने हों तो (‘यदि’ के साथ ‘तो’ का प्रयोग करते समय ‘तो’ के ठीक पहले ‘अल्प विरामचिह्न’ (,) नहीं लगाया जाता।) उनके विविध (यहाँ ‘विभिन्न’ का प्रयोग अशुद्ध है।) रूप इस प्रकार होंगे :–
१- मै खाता था। (अनिश्चित भूतकाल)
२- मै खा रहा था। (अपूर्ण भूतकाल)
३- मै खा चुका था।/ मैने खा लिया था। (पूर्ण भूतकाल)
४- मै दो दिनो से खा रहा था। (पूर्ण-अपूर्ण भूतकाल)
१- मै खाता हूँ। (अनिश्चित वर्तमान काल)
२- मै खा रहा हूँ। (अपूर्ण वर्तमान काल)
३- मै खा चुका हूँ।/ मै खा लिया हूँ। (पूर्ण वर्तमानकाल)
४- मै दो दिनो से खा रहा हूँ। (पूर्ण-अपूर्ण वर्तमानकाल)
१- मै खाऊँगा। (अनिश्चित भविष्यत् काल)
२- मै खा रहा हूँगा। (अपूर्ण भविष्यत् काल)
३- मै खा चुका हूँगा।/ खा लिया हूँगा। (पूर्ण भविष्यत् काल)
४- मै दो दिनो से खा रहा हूँगा।/खा लिया रहा हूँगा। (पूर्ण-अपूर्ण भविष्यत् काल)।
तीनो काल (तीनों ‘कालों’ अशुद्ध प्रयोग है।) के उपर्युक्त (‘उपरोक्त’ शब्द अशुद्ध है।) सभी वाक्य ‘व्याकरण’ के नियमो (‘नियमो’ अशुद्ध है।) के साथ बँधे हुए हैं। आप उन वाक्यों को जैसे ही व्याकरण के बन्धन से मुक्त करते हैं, आपके वे सभी वाक्य निरंकुश होते दिखते हैं।
आत्मसात करें :–
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★ शब्द-संस्कार विकसित करने के लिए प्रत्येक शब्द की सार्थकता और निरर्थकता का बोध करना होगा।
★ कुछ भी लिखने (लिखित भाषा) और कहने (मौखिक भाषा) के लिए सम्बन्धित शब्दों की पृष्ठभूमि को जानना अत्यावश्यक है।
★ शब्द-भेद और लिंग-विचार करने का/की सामर्थ्य जुटाना होगा।/ जुटानी होगी।
★ किस वाक्य के अन्तर्गत किस स्थान पर कर्त्ता छिपा है और वह किस लिंग का शब्द है, इनकी जानकारी होनी चाहिए।
★ शुद्ध शब्द-प्रयोग से शिल्पगत संस्कार और प्रस्तुति-शैली मे निखार आता है, जिससे प्रभावित होकर परीक्षक अधिकतम अंक देने के लिए विवश हो जाता है।
(क्रमश:)
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २५ नवम्बर, २०२२ ईसवी।)