
(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
कल (२१ अगस्त, २०१८ ईसवी) इलाहाबाद का एक हिन्दी-दैनिक समाचारपत्र देख रहा था। उसमें इलाहाबाद के उन लोग का नाम और चित्र था, जिन्हें मारीशस में सम्पन्न विश्व हिन्दी सम्मेलन में आमन्त्रित किया गया था। यह जानकर हतप्रभ रह गया कि ऐसे-ऐसे लोग मारीशस पहुँच गये थे, जिन्हें ‘हिन्दी-भाषा’ के ‘ककहरे’ तक की समझ नहीं है। उन सभी को किस आधार पर और किसके कहने पर वहाँ आमन्त्रित किया गया था, अब यह सुस्पष्ट होना चाहिए। ‘भारतीय जनता पार्टी’ और ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ के नेताओं की ‘चमचागिरी’ कर, उस वैश्विक आयोजन में उक्त प्रकार के अपात्र लोग की भागीदारी का होना, इस विषय की “डंके की चोट पर” पुष्टि करता है कि वहाँ ‘हिन्दी भाषिक’ दृष्टि से अधिकतर अयोग्य लोग का ही जमावड़ा था और वह मात्र एक सरकारी उपक्रम था, जो इस बिन्दु को ध्वनित कर रहा था– चलो! परम्परा है, मना लें। यही कारण है कि लगभग एक दशक से मनाये जा रहे उस ‘सरकारी मेले’ में अधिकतर ‘अनेरिया गाय’ (अनुपयोगी गाय) की तरह से प्रतिवर्ष भारत से लोग पहुँचते हैं और अपने ‘खोखले भाषाज्ञान’ को एक पोटली में शिथिलप्राय काँख में दबाये संवादहीनता से ग्रस्त रहते हैं।
वहाँ जुगाड़बाज़ भाषा-पण्डितों का वर्चस्व रहता है; उनकी ‘मुखरता’ सोयी रहती है, किन्तु स्वार्थपरता के प्रति जगती रहती है। यही कारण है कि ‘विश्व-हिन्दी-सम्मेलन’ में ऐसे प्रस्ताव पारित नहीं होते, जो ‘हिन्दी’-भाषा को शुचितापूर्ण गति दे सकें। ऐसा इसलिए भी कि आयोजकों की न वैसी मति है; न रति है तथा न गति है। यही कारण है कि हिन्दी-भाषा की आज वस्तुत: स्वतन्त्र अस्तित्व है ही नहीं, जो कि शोचनीय स्थिति है। आज हिन्दी के न तो मानक शब्द हैं और न ही उनका स्वतन्त्र व्याकरण और वैयाकरण हैं। अभी तक ग्यारह विश्व-हिन्दी-सम्मेलन आयोजित हो चुके हैं; परन्तु इस दिशा में तथाकथित आयोजकों का ध्यान लुप्त रहा है।
एक कौआ ‘काँव-काँव’ बोलता है—हिन्दीभाषा को ‘संयुक्त राष्ट्रसंघ’ की भाषा बनाने का मैं प्रस्ताव रखता हूँ (प्रस्ताव रखा नहीं जाता, किया जाता है।) उसके शीघ्र पश्चात् वहाँ उपस्थित सभी कौए बढ़चढ़कर ‘काँव-काँव’ कर अनुमोदित करने में जुट जाते हैं; जबकि उनमें से अधिकतर न ‘संयुक्त राष्ट्रसंघ’ के विषय में जानते हैं और न ही इस तथ्य से अवगत हैं कि संयुक्त राष्ट्रसंघ की कोई एक भाषा नहीं होती, फिर वह संघ किसी भी भाषा को ‘फोकट’ में स्वीकार नहीं करता, उसके लिए सम्बन्धित सरकार को अपनी जेब बहुत अधिक ढीली करनी पड़ती है; वहीं इसके लिए कोई बन्धन भी नहीं है— पैसा फेंको-तमाशा देखो। सऊदी अरब-जैसे अदने देश ने अपनी भाषा को जब वहाँ के कार्य-संचालन की भाषा बनवा ली है तब ख़ुद को सबसे बड़ा लोकतन्त्रीय देश कहलानेवाले भारत क्यों नहीं आगे आ रहा है? कहने और करने में अन्तर होता है; यहाँ ज़ुम्लेबाज़ी नहीं चलती; सम्पूर्ण विश्व में ‘थू-थू’ होना शुरू हो जायेगा और पाखण्डवाद की सारी कलई खुलने लगेगी, इसे भारत-सरकार के सभी सत्ताधारी ठीकेदार अच्छी तरह से जानते-समझते हैं।
स्मरणीय है कि इन्दिरा गांधी से लेकर राजीव गांधी, गुजराल, देवेगौड़ा, विश्वनाथ प्रताप, पी० वी० नरसिम्हा राव, अटलबिहारी वाजपेयी इत्यादिक के समय में भी यह विषय उठता रहा और तत्कालीन प्रधानमन्त्री और विदेशमन्त्री ठण्ढे बस्ते में डालते रहे। वही काम नरेन्द्र मोदी और सुषमा स्वराज भी कर रही हैं। यहीं पर काँव-काँव करनेवाले उक्त प्रकार के चरित्रवाले कौओं के मुँह में तब लक़्वा मार देता है जब देश की भाषा ‘हिन्दी’ निर्धारित करने का विषय आता है। लज्जा आनी चाहिए, ऐसे लोग को, जो सम्पूर्ण देश की समस्त गतिविधियों को ‘हिन्दीभाषा’ में सम्पादित करने का विरोध करते हैं और अकस्मात् उसे विश्व में शीर्ष पर देखना चाहते हैं। आज देश की अधिकतर शासकीय योजनाओं के नाम ‘अँगरेजी’ में उस सरकार के मठाधीशों ने मिलकर रखा है, जो कभी ‘हिन्दी-हिन्दू-हिन्दुस्तान’ की नारेबाज़ी करती थी। धिक्कार है, अपनी माता को ‘माता’ करने से परहेज करने, जबकि दूसरों से उसी उपेक्षिता को ‘माता’ कहलवाने के लिए व्यग्रता पालनेवालों को?
वाह-वाह! हिन्दीभाषा को इस तरह से जीनेवाले हिन्दुस्तानियो! मैं चुल्लूभर पानी लिये खड़ा हूँ; आ जाओ! विदेश राज्यमन्त्री एम० जे० अकबर, जो पहले विशेषत: अँगरेज़ी-भाषा की पत्रकारिता किया करते थे, ने पोर्ट लुई, मारीशस में आयोजित ‘ग्यारहवें विश्व हिन्दी-सम्मेलन’ में कितनी बेशर्मी से कहा था– हिन्दी विश्वभाषा बन चुकी है; जबकि उस व्यक्ति की, जब तथाकथित बड़े पत्रकारों में गणना होती थी तब उसने एक बार भी नहीं कहा था कि हिन्दी को ‘राष्ट्रभाषा’ का वैधानिक अधिकार मिले; फिर किसी के कह देने से हिन्दी विश्वभाषा बन जायेगी? उसके लिए अनेक प्रक्रियाएँ होती हैं। क्या हिन्दी को पश्चिमी एशियाई देश, यूरोपीय आदिक देश स्वीकार करेंगे।
आश्चर्य तब और हुआ जब विदेशमन्त्री सुषमा स्वराज भी वहाँ पहुँच कर अपना एक अलग ही रूप दिखा गयीं; और वह यह कि मारीशस में ‘पाणिनि भाषा प्रयोगशाला’ का उद्घाटन कर गयीं। निस्सन्देह, ‘पाणिनि भाषा प्रयोगशाला’ एक उत्कृष्ट व्यवस्था है; परन्तु इसको विश्व हिन्दी-सम्मेलन’ में आरम्भ करने का कोई औचित्य नहीं था। पहली बात तो यही कि सुषमा स्वराज के साथ जितने भी लोग उद्घाटन करने-कराने में लगे थे, उनमें से सुषमा स्वराज के अतिरिक्त (हो सकता है सुषमा स्वराज भी) और सभागार में बैठे अधिकतर लोग न तो शुद्ध ‘पाणिनि’ लिख सकेंगे और न ही शुद्धतापूर्वक उच्चारण कर सकेंगे। २० अगस्त, २०१८ ईसवी को देश के समाचारपत्रों में ‘पाणिनी’ मुद्रित था; दूसरा विषय यह कि ‘अष्टाध्यायी’-प्रणेता विचक्षण पाणिनि का हिन्दी-भाषा से कोई प्रयोजन नहीं था और सम्मेलन हिन्दीभाषा को लेकर था, न कि संस्कृतभाषा से सम्बन्धित था। ऐसे में, यदि ‘हिन्दीभाषा-व्याकरण-प्रयोगशाला’ का उद्घाटन किया जाता तो उसकी प्रासंगिकता रेखांकित होती। सुषमा स्वराज ‘इतनी’ कुन्द बुद्धि की नहीं हैं; उन्हें इस विषय को अपने दृष्टिपथ पर अनिवार्यत: लाना चाहिए था कि हिन्दीभाषा की शुचिता बनाये रखते हुए, सामान्य स्तर पर ‘हिन्दीभाषा-व्याकरण कर्मशाला’ (यहाँ प्रयोगशाला अनुपयुक्त शब्द है।) की व्यवस्था की जाती; वहीं एक चुनौतीपूर्ण प्रश्न है— ‘पाणिनि-भाषाधर्मिता’ के साथ ‘प्रयोग’ करने की सामर्थ्य विश्व के किस ‘पण्डित’ में है? मैं ‘मुक्त मीडिया’ (सोसल मीडिया) के माध्यम इसका उत्तर चाहता हूँ; क्योंकि यहाँ भी अवसरवादी और चरणचाटू चाटुकार विद्वान लोग की कोई कमी नहीं है।
एक तरह से सुषमा स्वराज का यह कृत्य आपत्तिजनक है। आज हमें शब्दानुशासन की रक्षा करते हुए, हिन्दीभाषा को ‘क्लिष्टता से सुगमता की ओर’ ले आने की आवश्यकता है; क्योंकि हमारे देश की अधिकतर हिन्दीभाषा-विद्वान्-विदुषी स्वयं के लेखन और वाचन में इतनी अशुद्धियाँ करती हैं, जो उनकी विद्वत्ता और वैदुष्य को व्याकरणिक प्रश्नों के कटघरे में ला खड़ा करती हैं।
कभी-कभी देश के विद्वज्जन के भाषिक आचरण की सभ्यता से मेरा मन-मानस इतना उद्विग्न और उद्वेलित हो उठता है कि लगता है कि तत्काल उनके समीप पहुँचकर ‘भाषिक शास्त्रार्थ के लिए उन्हें ललकारूँ; परन्तु जल पर लाठी का प्रहार करने के परिणाम और प्रभाव का स्मरण आते ही, स्वयं के साथ संवाद कर, मन को नियन्त्रित कर लेता हूँ; आत्मनिग्रह की स्थिति प्राप्त कर लेता हूँ.
अब प्रश्न है, पिछला विश्व हिन्दी-सम्मेलन वर्ष २०१५ में जब भोपाल में हुआ था तब हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने का प्रस्ताव किया गया था तब सुषमा स्वराज सरकार में थीं और आज भी है, सुषमा स्वराज उत्तर दे सकेंगी– लगभग चार वर्षों में हिन्दी को भारत की राष्ट्रभाषा का वैधानिक स्थान दिलाने के लिए क्या-क्या कार्य किये गये हैं? क्या मारीशस में सुषमा स्वराज को अपने अनेक पिछले प्रस्तावों की सुधि रही है?
खेद है, वैश्विक आयोजनों के नाम पर देश को मूर्ख बनाया जाता रहा है और ‘दलाल’ क़िस्म के हिन्दीभाषा-संरक्षक अपना-अपना उल्लू सीधा करते आ रहे हैं। वर्ष-पर्यन्त मौन रहेंगे और जैसे ही विश्व हिन्दी-सम्मेलन आयोजन की भनक मिलती है, सभी बरसाती मेढक की तरह से बिल से निकलकर टरटर्राने लगते है। इस तरह से अयोग्यों का वर्चस्व सुस्पष्टत: परिलक्षित होता आ रहा है। यह भी सुस्पष्ट हो जाता है कि उस वैश्विक हिन्दी-आयोजन ने ऐसे कुपात्रों को अपने हाशिये से भी बाहर कर दिया है।
भविष्य में जब भी ऐसे आयोजन हों तब किसी भी देश के राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमन्त्री, मन्त्री, राज्यपाल, मुख्यमन्त्री तथा किसी भी प्रकार के राजनेता तथा प्रशासनिक अधिकारियों की भागीदारी की परछाईं से भी समारोह को दूर रखा जाये और स्वस्थ मनोवृत्तिवाले हिन्दीभाषा-व्याकरण के विद्वज्जन के संंरक्षण में उनको गति दिया जाये। इसके लिए सभी को एक मन होना होगा, जो कि तराज़ू के दोनों पलड़ों पर जीवित मेढकों को रखकर उन्हें तोलने के समान है।
(सर्वाधिकार सुरक्षित– डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, इलाहाबाद; २२ अगस्त, २०१८ ईसवी)