राष्ट्र की युवाशक्ति की उपेक्षा क्यों?

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय-


देश के स्नातक-उपाधि-प्राप्त समस्त अनियोजित (बेरोज़गार) युवाओं के लिए सरकार ‘मानधन’ देने की व्यवस्था करे, अन्यथा युवावर्ग दिग्भ्रमित हो जायेगा और नकारात्मक पथ का पथिक बनकर आत्महन्ता और दुर्द्धर्ष रूप को प्राप्त कर जायेगा, जिसे नियन्त्रित कर पाना “लोहे के चने चबाना” सिद्ध होगा।
पूर्णत: दिशाहीन शिक्षापद्धति के परिणाम और प्रभाव ने देश की युवाशक्ति की चेतना को सुसुप्त बनाकर रख दिया है। देश का मूलभूत शैक्षिक वातावरण विषाक्त बना दिया गया है। शिक्षा-संस्कृति को विकृत करने की केन्द्र-राज्य-शासन की प्रत्यक्ष-परोक्ष अकर्मण्यता परिलक्षित हो रही है। शिक्षामन्दिर में गर्हित राजनीति की मूर्तियाँ स्थापित कर, सारस्वत सात्त्विकता का स्खलन किया जा चुका है।
आज पठन-पाठन, अध्ययन-अध्यापन, अनुशीलन-परिशीलन, चिन्तन-अनुचिन्तन, सन्धान-अनुसन्धान तथा ग्रहणशीलता पक्षाघात-रोग से ग्रस्त हो गयी हैं। एक सामान्य अध्यापक से लेकर कुलपति तक के पास अवकाश नहीं है कि वे कुत्सित और विद्यार्थी-भविष्यघातक शिक्षापद्धति को ‘शिक्षा के मूल उद्देश्य’ के परिप्रेक्ष्य में समझने का प्रयास करें और समुचित परिष्कार की व्यावहारिक सम्भावनाओं के साथ स्वयं को जोड़ें।
अब भी समय है, राजनीति के वितण्डावाद से शैक्षणिक परिसर को सुदूर करें और ‘कलह’ की आराधना के स्थान पर ‘समन्वय’ और ‘सामंजस्य’ की स्थापना करने की दिशा की ओर अग्रसर हों।