अभिषेक कांत पांडेय prakharchetnablogspot.com
जातिप्रथा समाज में सबसे बड़ी बुराई बनी हुई है। हिंदू समाज अगड़े, पिछड़े व दलित जातियों में बंटा है। यही नहीं अलग-अलग धर्म के लोगों में भी अपनी संस्कृति व विचारों को सर्वश्रेष्ठ बताने की होड़ ने एक दूसरे के बीच कटुता का विष घोल दिया है, इस कारण से मानवीय जीवन मूल्यों को भुला दिया गया है। दो धर्मों के बीच राज करने की नीति के लिए बांटने की लकीर खींचने की नींव अंग्रेजों ने ही डाली थी। हिंदू व मुस्लिमों के बीच मतभेद पैदा करने, फूट डालों और शासन करों की नीति ही आज स्वतंत्र भारत की राजनीति में वोट बैंक पाने का आसान तरीका है।
दो धर्मों के बीच तुष्टीकरण बनाम अतिवादी नीति ने विकास के मुद्दे को धरातल पर लाकर खड़ा कर दिया है। विकास का मुद्दा चुनाव आते आते धर्म और जाति की राजनीति में बदल जाता है। जाहिर है कि राजनीति दलों के लिए सत्ता में वापसी करने के लिए जाति व धर्म विशेष का धु्रवीकरण कर वोट बैंक को साधना आसान है। वहीं मूल समस्या पर जनता की नजर न जाए, इसलिए धार्मिक भावनाओं को भुनाना राजनीतिक दल शुरू करते हैं। लेकिल सच्चा व वाजिब सवाल तो यह है कि हम विकास के पैमाने पर तब तक खरे नहीं उतरेंगे जब तक हम जातीय व धार्मिक भेदभाव को त्याग नहीं देते हैं। राजनीतिक दल हमारे इसी कमी का फायदा उठाकर वे हमसे चुनाव के समय बार्गनिंग करते हैं कि फला दल एक धर्म का हितैषी है तो हम तुम्हारे धर्म के हितैषी है या हम इस जाति की तरक्की को ध्यान में रखेंगे, बस हमें वोट दो, हम तुम्हारी जाति, तुम्हारे धर्म का भला करेंगे। इस तरह की बातें आपको इन राजीनैतिक दलों के भाषण व इनके मैन्यूफेस्टों से आप आसानी से समझ सकते हैं। अगर आप काम व विकास को तवज्जों दें तो मजाल नहीं कि राजनीतिक दल का कोई नेता आपको जाति या धर्म के नाम पर बरगला सके। लेकिन विडंबना तो यही है कि चुनाव में अगर उम्मीदवार की जाति या धर्म देखकर हम अपना प्रतिनिधित्व चुनेंगे तो हमें सही विकास के लिए एक और 69 साल के समय का इंतजार करना होगा। जिस तरह से हम बीमार होने पर इलाज के लिए डाॅक्टर की जाति नहीं देखते हैं बल्कि उसकी काबिलियत देख कर इलाज के लिए उसे चुनते हैं, इस तरह बीमारी से जल्द छुटकारा पाते हैं, क्यों न तब हम इस देश के बीमार सिस्टम को दुरूस्त करने के लिए हम अच्छे और कर्मठ प्रतिनिधि का चुनाव करें, न कि उसका धर्म व जाति देखकर।
सरकारी सिस्टम को रिपेयर करने के लिए जब तक भारत का नागरिका खुद जिम्मेदारी निभाने के वास्ते सामने नहीं आएगा तब तक हम सही मायने आजाद नहीं है। देश का जिम्मेदार व जागरूक नागरिक ही देश को सही रास्ते में ले जाता है, क्योंकि लोकतंत्र में उसके पास वोट का अधिकार है। वह राजा नहीं प्रतिनिधि चुनता है, अगर उसका प्रतिनिधि उनके वादे पर खरा नहीं उतरे तो उसे बाहर का रास्ता दिखा सकता है। लेकिन जब जाति व धर्म की दीवारें बीच में खिंच जाती हैं तो हम अपने जाति व धर्म के नकारे प्रतिनिधित्व को बाहर का रास्ता दिखाने में पीछे रह जाते हैं, और तब इसी का फायदा राजनीतिक दल उठाते हैं।
अब समय आ गया है कि हम अपने चुने हुए प्रतिनिधि से हिसाब ले, जानकारी इकट्ठा करें, मोहल्ला या गांव सोसाइटी बनाकर उन्हें चिट्ठी पकड़ाए और उनकी जवाबदेही तय करें कि कितना विकास हुआ। हमारे क्षेत्र की सड़कें, बिजली, पानी की व्यवस्था और किए गए काम की क्वाॅलिटी को भी चेक करें। तब उनको पता चलेगा कि जनता ही है लोकतंत्र में सर्वोपरि।