
(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय-
हमने जब अँगरेज़ी तिथि, माह तथा वर्ष अङ्गीकार कर लिये हैं तब उन्हें ‘आङ्गल’ कहकर, उनका तिरस्कार करना बुद्धिमत्ता नहीं। जीवन-मरण की गणना भी उन्हीं के आधार पर की जाती हैं; उनके बिना हमारी गतिविधियाँ सुव्यवस्थित नहीं हो पातीं; संचालित नहीं हो पातीं तथा हम एक डग भी बढ़ नहीं पाते।
भारतदेश का जो भी व्यक्ति ‘एक से इकतीस’ तिथि ‘जनवरी से दिसम्बर’ माह तथा ‘एक से अन्तिम वर्ष’ तक की स्वयंसिद्ध महत्ता की अवहेलना, उपेक्षा तथा तिरस्कार कर, अपना अतिरिक्त पाण्डित्य और कर्मकाण्ड का प्रदर्शन करता है, वह ‘नितान्त कृतघ्न’ है।
भारतवर्ष में कितने लोग हैं, जो ‘पूर्णिमा से ‘अमावस्या’ तक, दो पक्षों में विभाजित तीस तिथियों का व्यवहार अपने दैनन्दिन के जीवन की गतिविधियों में करते हैं; ‘चैत्र से फाल्गुन’ मास, वर्ष प्रतिपदा’ से अपनी समस्त गतिविधियाँ समारम्भ और सम्पन्न करते तथा ‘संवत्’ का व्यवहार करते हैं?
वाह! उपयोग और उपभोग करते समय ऐसे जनसमूह का ‘पाण्डित्यपूर्ण’ तर्क विलुप्त हो जाता है। ज्ञातव्य है कि भारत में उपयोग और उपभोग की जितनी भी वस्तुएँ हैं, अधिकतर अभारतीय हैं; उनका आविष्कार विदेशियों ने किये थे, तो क्या भारतीय लोग उनकी देन की उक्त ढंग से उपेक्षा करेंगे?
देश में जितनी भी अति महत्त्व की सड़कें हैं, उन्हें या तो मुग़ल बादशाहों ने बनवाये थे अथवा अँगरेज़ अधिकारियों ने। भारतीय तो ‘महा बेईमान’ निर्माणकर्त्ता के रूप में जग-ज़ाहिर हैं। कई सड़कें अभारतीय शासकों के नाम से भी जानी जाती है। ऐसे में, हम यह नहीं कहते : हम मुसलमान शासक शेर शाह सूरी के ‘ग्रैण्ड ट्रैंक रोड’ पर चल रहे हैं। हमने यदि उन सभी वस्तुओं को अङ्गीकार कर लिया है तो हमें उनके साथ ‘विभेदीकरण’ करने की मानसिकता का परित्याग करना होगा।
वैसे अधिकतर भारतीय कृतघ्न होते देखे गये हैं। वे वस्तुओं का उपयोग-उपभोग यथासामर्थ्य करते हैं परन्तु अपनी भावना-संवेदना के साथ तादात्म्य स्थापित नहीं करते; हमेशा अभेद को ‘भेद’ की गोद में बिठाकर चलते बनते हैं, जो कि ‘भर्त्सना’ के योग्य है।
आँखें खोलिए!