● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
ये तो कुछ उदाहरण हैं। मैने कल (११ जून) परीक्षण के तौर पर कई विषयों को पढ़ानेवाले लोग (लोग ही कहूँगा, ‘अध्यापक’/’अध्यापिका’ नहीं।) को ‘वाचिक’ और ‘लिखित’ स्तर पर समझा था; खेद है! एक भी व्यक्ति १०० मे से ३३ अंक के योग्य भी नहीं दिख रहा है।
विद्यार्थी के नाम पर जो लोग ‘यूट्यूबरों’ से ज्ञान प्राप्त करते आ रहे हैं, उनमे से लगभग सभी दिशाहीन दिख रहे हैं :― जो भी समझा दो; लिख दो; सुना दो, उनके लिए सब एक बराबर है। इस पर नियन्त्रण अपरिहार्य है, अन्यथा शैक्षिक स्तर हीनतम स्थिति को प्राप्त करती दिखेगी।
शिक्षा के संदर्भ मे ‘यूट्यूब’ उपयोग करने की अनुमति उन्हें ही दी जानी चाहिए, जिनका शैक्षिक स्तर उच्च कोटि का हो। इसके लिए मौखिक और लिखित परीक्षाओं को आधार बनाना होगा, तभी ‘यूट्यूब’ पर शिक्षा की गुणवत्ता लक्षित होगी।
अब प्रश्न है, ‘यूट्यूब’ अध्यापन के नाम पर ‘धन्धा’ क्यों बन चुका है?
(सर्वाधिकार सुरक्षित― आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ११ जून, २०२३ ईसवी।)