मतदान आपकी जिम्मेदारी, ना मज़बूरी है। मतदान ज़रूरी है।

“न खाऊँगा और न खाने दूँगा” कहनेवाले का बीभत्स दर्शन

आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय


● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••
खा तो इतना लिया है कि अन्धों को भी दिखने लगा है। उसने दूसरों की थालियों को बलपूर्वक अपनी ओर खींच लिया है, फिर खाने कैसे देगा? उसने हमारी थाली खींचकर उनकी ओर बढ़ा दी है, जो ‘मुफ़्त की रेवड़ी कल्चर’ मे रह रहे हैं।

वह कुत्सित-कलुषित चरित्र का व्यक्ति हर प्रकार की अवैध-वैध सुविधाओं का उपभोग तो कर ही रहा है, “एकोहम् द्वितीयो नास्ति” की भूमिका मे भी जीता आ रहा है; मगर कब तक?

 भ्रष्टाचार का काला धन लानेवाले ने कहा था-- नोटबन्दी कराकर काला धन लाऊँगा; अफ़्सोस! वह व्यक्ति आज तक कथित काला धन नहीं ला सका; यहाँ तक कि जनता-द्वारा बैंकों मे जमा किये गये नोटों की संख्या का विवरण भी नहीं दे पा रहा है। स्विट्ज़रलैण्ड आदिक देशों के बैंकों मे किन-किन भारतीयों के काले धन जमा हैं, यह भी तो नहीं बता रहा है। 'पी० एम० केअर फण्ड' के नाम पर जो बहुत बड़ी संख्यावाली धनराशि का घोटाला किया गया है, उस पर तो वह चुप्पी साधे हुए है।
  जो व्यक्ति केवल विपक्षी दलों के नेताओं के घर चुन-चुनकर छापा मरवा रहा है, वह अपने दल मे कुण्डली मारकर बैठे भ्रष्टाचारियों पर मेहरबान क्यों है? जो व्यक्ति सुस्पष्ट: कहता है-- मै पढ़ा-लिखा नहीं हूँ, फिर अपनी अवैध डिग्रियों का प्रदर्शन क्यों कराता है? ३७ वर्षों तक भिक्षा मागकर खाने की बात करता है और आज पूरे देश को ही भिखमंगा बनाने पर उतारू है। 

आजका लगभग हर पत्रकार डरा हुआ है, क्यों?
अन्धभक्तवृन्द हिन्दुत्व के पुजारी! इन विन्दुओं पर भी आप कुछ निष्पक्षतापूर्वक प्रकाश डालना चाहेंगे?

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ५ अगस्त, २०२२ ईसवी।)