● एक ‘भाषाविज्ञानी’ का ‘देश के समस्त संस्कृत-हिन्दीभाषा के पण्डितों’ से एक तार्किक प्रश्न :–
‘अयोगवाह’ (ं और ः) को जब न ‘स्वरों’ ने स्वीकार किया है और न ही ‘व्यंजनों’ ने, अर्थात उन दोनों को ही ‘दलित’ बना दिया गया है। दूसरे शब्दों में :– उन्हें ‘तृतीय लिंगधारी’ का नाम-रूप दे दिया गया है। ऐसे में एक स्वाभाविक प्रश्न है :– ‘अयोगवाह’ को देवनागरी लिपि की हिन्दीभाषा में ‘वर्णमाला के अन्तर्गत स्थान क्यों दिया गया है?
‘शब्दानुशासन’ के अन्तर्गत ऐसी व्यवस्था की गयी है कि अयोगवाह न तो ‘स्वरमण्डल’ में सम्मिलित है और न ही ‘वर्णमण्डल’ में।
वास्तविकता यह है कि शुद्ध वर्णों की कुल संख्या चौवालीस (४४) है, जिनमें से ग्यारह (११) स्वर हैं और तैंतीस (३३) व्यंजन। संयुक्त व्यंजनों :– क्ष, त्र, ज्ञ तथा श्र और उत्क्षिप्त व्यंजनों :– ड़ और ढ़ का कोई स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं है।
यह तो एक प्रकार से दलबदलुओं का चरित्र -चित्रण है। अवसरवादी राजनीतिक दलों की तरह से अपनी ‘शब्दशक्ति’ को प्रखर और प्रभावकारी बनाने के लिए “सबका साथ सबका विकास” का लोभ दिखाकर अपने साथ करते हुए कुल संख्या ‘बावन’ (५२) कर ली और जब उन्हें ‘वर्ण’ के रूप में ‘मान्यता’ देने की बात आयी तब ‘पल्ला’ झाड़ लिया।
(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १ अगस्त, २०१९ ईसवी)