हिन्दी-व्याकरण/शब्दानुशासन का विरोध करनेवालो-वालियो!
कई दशक से तुम सभी की कलुषित-कुत्सित मानसिकता को पढ़ता आ रहा था; सोचता था, शायद सुधर जाओ; परन्तु वस्तुस्थिति ‘अन्यथा’ दिखती आ रही है। जब ‘एक व्यक्ति’ इस देश मे ‘अकेले’ शुद्ध शब्दप्रयोग करने-कराने के प्रति कृत-संकल्प है; मुक्त हस्त से ‘विद्या’ लुटा रहा है तब तुम सब एक साथ विरोध करने मे लग गये हो? कान खोलकर सुन लो! जब तक मेरी ज्ञानेन्द्रियाँ और कर्मेन्द्रियाँ मेरे साथ जीवित रहेंगी तब तक तुम सभी को ‘भाषास्तर’ पर चैन से सोने नहीं दूँगा। अशुद्ध बोलोगे, लिखोगे, पढ़ोगे, पढ़ाओगे और मैने यदि इन सभी पक्षों का संज्ञान किया तो अपने अध्ययनकक्ष से ‘व्याकरण’ और ‘भाषाविज्ञान’ के ‘सभी नियमो’ को खुला छोड़ दूँगा, जो तुम सभी को लथेड़-लथेड़कर ‘अधमरा’ कर देंगे।
तुम सभी विश्वासघाती हो। तुममे से जितने भी लोग अध्ययन-अध्यापन कर रहे हैं, वे पहले अपनी शैक्षिक पृष्ठभूमि को समझ लें :– उन सभी ने नक़्ल करके; प्रश्नपत्र ‘लीक’ कराकर, पहुँच और रिश्वत के बल पर ‘नौकरियाँ’ पायी हैं; अयोग्यता और कुपात्रता के बावुजूद ‘आरक्षण-कोटे’ से नौकरी पाकर उनमे से कई अपने से ‘योग्यतर’ और ‘मेधावी’ अभ्यर्थी के हिस्से मे ‘सेंध’ मारकर’ इतरा रहे हैं? तुम सब रात-दिन लगकर ‘सामान्य हिन्दी’ की पुस्तक क्यों पढ़ते हो? क्यों संधि, समास, प्रत्यय, उपसर्ग का अध्ययन करते हो?
तुम सब क्यों नहीं बोलते-लिखते-पढ़ते :– मेरा पत्नी/बहन/बेटी/मा मेरी बहुत बड़ा ध्यान रखता है? मेरी भाई दुई मा पढ़ती है। मेरी पति मुझे बड़ी चाहती है। तब तो डर लगता है– समाज तुम सभी के चेहरे पर थूकेगा और व्याकरण-भाषाविज्ञान लात मारकर, बाहर का रास्ता दिखा देंगे।
तुम सब अपना और अपने घर की सदस्य-सदस्याओं के नामकरण कराते समय ‘साहित्यिक’ और ‘रचनात्मक’ नाम पर ही केन्द्रित क्यों रहते-रहती हो? अपना नामकरण ‘हगुआ’, ‘मुतुआ’, ‘पदुआ’, ‘छिछोरा’, ‘छिछोरी’ ‘भगोड़ी’, ‘निगोड़ी’, ‘मरही’ आदिक क्यों नहीं करते? ये सभी नाम ‘व्याकरणमुक्त’ हैं।
तुम सभी व्याकरण-विरोधी लोग! अपने परिवार की सदस्य-सदस्याओं के लिए ‘व्याकरण’ की पुस्तक ख़रीदकर क्यों लाते हो? क्यों कहते हो– मैं सहायक अध्यापक, सहायक प्राध्यापक, विद्यार्थी, अभ्यर्थी, परीक्षार्थी हूँ? तुम सभी व्याकरणविरोधियों को कहना चाहिए– मैं सहायका अध्यपका, सहायका प्राध्यापका, विधार्थी, अभ्यार्थी, परिछार्थी हूँ। ऐसा कहने मे तो तुम सबको शर्म आती है; क्योंकि तब तो सोचते हो– लोग क्या कहेंगे?
… तो हे दोगली मानसिकतावाले लोग! यदि अपना ‘चरित्र’ नहीं बदल सकते; ‘क्रीत-दासत्व’ से मुक्त नहीं हो सकते तो हमारी व्याकरणसम्मत टाँगों के नीचे मत आओ; कुचल दिये जाओगे।
व्याकरण-भाषाविज्ञान के ऐसे मुखर विरोधी लोग को ललकारता हूँ, “आ जाओ मैदान मे, जहाँ भी चाहो, जब चाहो और मेरे साथ ‘संवाद’ करो, ‘व्याकरणरहित होकर और व्याकरणसहित होकर भी।” है साहस?
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १९ अक्तूबर, २०२२ ईसवी।)