कल (२४ अप्रैल) राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ जी की निधनतिथि थी।
प्रस्तुत है, एक प्रेरक प्रसंग :―
(प्रथम प्रधानमन्त्री पण्डित जवाहरलाल नेहरू ने रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की साहित्यिक प्रतिभा से प्रभावित होकर उनका मनोनयन राज्यसभा के सदस्य के रूप मे किया था।)
एक बार की बात है, पं० नेहरू जी और दिनकर जी साथ-साथ राज्यसभा की सीढ़ियों से उतर रहे थे कि सहसा, पं० नेहरू जी के पाँव सीढ़ियों पर से लड़खड़ा उठे थे। उसे देखकते ही दिनकर जी ने उन्हें बाँहों का सहारा देकर सँभाल लिया था। इस पर नेहरू जी ने उनके प्रति विनम्र भाव के साथ आभार व्यक्त किया था, जिस पर दिनकर जी ने कहा था, “पण्डित जी! जब राजनीति लड़खड़ाती है तब ‘साहित्य’ ही उसे सँभालता है।”
इस पर पं० नेहरू जी मुसकराकर रह गये थे।
अस्तु देश के राजनेताओ! श्रेष्ठ साहित्य और साहित्यकारवृन्द की प्रतिष्ठा करना सीखो, चाटुकारों का नहीं।
(सर्वाधिकार सुरक्षित― आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २५ अप्रैल, २०२३ ईसवी।)