देश के शासनसंचालकवृन्द!
जय भारत।
मैने देशवासियों की मानसिक स्थिति और उसकी आह-संवेदना का प्रतिनिधित्व करते हुए, यह पत्र आप सभी के नाम समवेत रूप मे निर्भीकतापूर्वक प्रेषित किया है।
आप लोग समस्त शासन-संचालकों को देश के मतदाताओं ने अभूतपूर्व मतों से विजयश्री उपलब्ध कराकर इसीलिए सत्ता सौंपी थी कि देश की विकृत हो चुकी दशा-दिशा को स्वस्थ उपचार प्राप्त हो। आप सबके पास एक ऐसा अवसर था, जहाँ अपने सत्कर्मों के आधार पर ‘रामराज’ की परछाईं के आंशिक भाग का दर्शन इस देश के जनताजनार्दन को करा सकते थे। देश की जनता इसी आशा मे ९ वर्ष व्यतीत कर चुकी है। आज देश की स्थिति विस्फोटक बना दी गयी है; उसे ‘प्राणवायु-उपकरण’ पर लेटा दिया गया है। इसका स्पष्ट कारण है, आप सभी की अलोकतन्त्रीय कार्यप्रणाली; विधि-निषेध नीति और निर्णय।
सबसे पहले आप सबने देश की एकमात्र समर्थ और शक्तिमान् विपक्षी दल ‘भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस’ की जड़ मे मट्ठा डालते रहने का उपक्रम आरम्भ किया और उसी मे अपनी सारी शक्ति खपा दी। वह कृत्य निरन्तर गतिमान् है। एक सुशिक्षित, राजनीतिक व्यक्ति को ‘परिवारवादी’ और ‘पप्पू’ सिद्ध करने के निरर्थक प्रयास मे आप लोग ने अपनी सारी शक्ति व्यर्थ कर दी है, जो कि ‘नकारात्मक दृष्टिबोध’ का परिचायक रहा। आपलोग यदि उस ‘पिताविहीन’ को ‘पप्पू’ के स्थान पर एक ‘आदर्श पुत्र’ के रूप मे संरक्षण किये रहते तो यह जगत् आप सबका ‘महिमामण्डन’ कर रहा होता।
देश की जनता अच्छी तरह से जान चुकी है कि एक पार्षद वा सभासद से लेकर सांसद और मन्त्री आदिक तक भ्रष्ट हैं; सरकारी अधिकारी तो महाभ्रष्ट हैं, कदाचित् अपवाद के रूप मे कहीं कोई दिख जाये। आप सबने संवैधानिक संस्थाओं का खुला दुरुपयोग करते हुए, विधायकों, सांसदों तथा अधिकारियों के विरुद्ध तरह-तरह की काररवाई करायी हैं और कराते आ रहे हैं। कभी विचार किया, आप लोग के दल मे जो विधायक, सांसद तथा मन्त्री हैं; आपके क्रीतदास-संकेतदास जितने भी अधिकारी हैं, उनमे से कितने “दूध के धुले” हुए हैं? यहाँ पर आप सभी ‘धृतराष्ट्र’ और ‘गान्धारी’ की भूमिका मे परिलक्षित होते आ रहे हैं। जिस-जिस राज्य मे न तो आप लोग की अपनी और न ही तथाकथित ‘डबल इंजन’ की सरकारें हैं उस-उस राज्य मे आरम्भ से ही आप सबकी टेढ़ी भृकुटि दिखती आ रही हैं; क्यों? वहाँ तो उन्हें ई० डी०, आइ० टी० डी०, सी० बी० आइ० इत्यादिक संवैधानिक संस्थाओं के माध्यम से डराया-धमकाया जाता आ रहा है। आप लोग ने वर्ष २०१४ से अब तक भारतीय जनता पार्टी और डबल इंजन की सरकारवाले राज्यों :― उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, गुजरात, हरियाणा, गुजरात, गोवा, कर्नाटक, अरुणाचलप्रदेश, त्रिपुरा, सिक्किम, मिज़ोरम, असम, मणिपुर, मेघालय इत्यादिक मे कितनी बार वहाँ के दोषसिद्ध राजनेताओं, मन्त्रियों, अधिकारियों आदिक के घरों और कार्यालयों मे छापेमारी करायी है वा फिर पूछताछ के लिए सी० बी० आइ० भेजी है? विपक्षी दल का राजनेताओं के विरुद्ध ‘आरोपपत्र’ तैयार कराया जाता है; उसे डराया-धमकाया जाता है, फिर वही डरा-सहमा राजनेता जब सत्तासीन दल मे शामिल हो जाता है तब उसके ‘सातों ख़ून’ मुआफ़ कर दिये जाते हैं। इस कुकुत्य से आजका राजनैतिक संदर्भ भरा पड़ा है।
सत्य तो यह है कि आज का प्रधानमन्त्री एक दल-विशेष का ‘प्रधानमन्त्री’ बनकर रह गया है। उसे ‘आत्मप्रचार’ ने ऐसा सम्मोहित कर लिया है कि सभी मानदण्ड ध्वस्त हो चुके हैं। देश का मीडिया-तन्त्र वही दिखाता-सुनाता-बताता है, जितना उसे कहा गया है। प्रधानमन्त्री मे अपनी ‘निन्दा’ सुनने की सामर्थ्य नहीं है; वह सुनना चाहता है तो ‘प्रशंसा’, भले ही वह ‘कपोल-कल्पित’ हो। वर्ष २०१४ से अब तक प्रधानमन्त्री विपक्षी दलों, विशेषत: ‘भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस’ के विरुद्ध जिस तरह से ‘विषैले’ और ‘अति उत्तेजक’ शब्दों का व्यवहार सार्वजनिक रूप से करते आ रहे हैं, वह शोचनीय है। ऐसा प्रतीत होता है, मानो देश को ‘अधिनायकतन्त्र’ ने डँस लिया है। निस्संदेह, संवैधानिक दृष्टि से यह देश लोकतान्त्रिक है; परन्तु व्यवहार-स्तर पर पूर्णत: ‘निरंकुशतन्त्र’ लक्षित हो रहा है। इस समय देश मे एक प्रकार का अघोषित ‘महा-आपात्काल’ लागू है। प्रवर्त्तन-निदेशालय, केन्द्रीय जाँच ब्यूरो, आयकर-विभाग तथा चुनाव-आयोग के अधिकारियों की स्वेच्छाचारिता जगज़ाहिर है, जिसे हमारी न्यायपालिका के शीर्षस्थ न्यायाधीश और सम्बन्धित संविधानपीठ के न्यायाधीशवृन्द समय-समय पर सार्वजनिक करते आ रहे हैं। जब न्यायालय से यह शोचनीय स्वर उभरे :– ”सरकार नपुंसक और शक्तिहीन हो चुकी है” तब उस सरकार के लिए बचा ही क्या? अब एक ऐसा नियम बनना चाहिए कि यदि देश मे कोई सरकार जनघाती सिद्ध होती दिखे तो उच्चतम न्यायालय के माध्यम से नियमत: उसे हटाकर दूसरे क्रम के दल को सत्ता-संचालन का दायित्व सौंप दिया जाये। इससे शासन-द्वारा किये जा रहे अनाचार, अत्याचार तथा कदाचार पर नियन्त्रण होगा।
शासक तो समदर्शी होता है; मर्यादापोषक होता है तथा “नीर-क्षीर विवेकी” भी। मात्र एक प्रजा के उपालम्भ/परिवाद पर राम ने अपनी पत्नी का त्याग कर दिया था। आप लोग के शासन मे प्रजा मौन है; भयाकुल है; संत्रस्त है। ‘जय श्री राम’ का जयघोष करनेवाले आपके शासन मे कितने लोग हैं, जो ‘रामत्व’ की अवधारणा से सुपरिचित हैं? आप घण्टा-घड़ियाल बजायेंगे; खम्भों पर चारो दिशाओं मे लाउडस्पीकर टँगवाकर ‘कानफाड़ू’ शोर सुनवायेंगे; काँवड़ निकालने के समय पर विलम्ब रात्रि मे इस बस्ती से उस बस्ती तक हृदयघातक ड्रम बजवाकर अपने तथाकथित धर्म का जुलूस बिना अनुमति के निकलवायेंगे और यदि कोई कहीं बैठकर अपने ‘अल्लाह’ को याद कर रहा होता हो तो उस पर ज़ुल्म ढायेंगे और उससे बलात् ‘जय श्री राम’ कहलवायेंगे। यही ‘धार्मिक स्वतन्त्रता’ है? आप लोग के शासन-संचालन मे ऐसा कब तक होता रहेगा? आप लोग का ‘हिन्दूराष्ट्र’ केवल ‘राजनैतिक’ लाभ के लिए है। राम स्वयं को ‘सूर्यवंशी’ कहते थे; कृष्ण ‘यदुवंशी’ कहते थे, फिर किस देवी-देव ने स्वयं को ‘हिन्दूवंशी’ कहा है? ‘हिन्दू’ शब्द के नाम पर कब तक छल होता रहेगा?
आपके शासन मे एक व्यक्ति-विशेष की शैक्षिक उपाधि पर प्रश्न किये जाने पर धमकियाँ दी जाती हैं; ‘पुलवामा-प्रकरण’, ‘अडानी-अम्बानी’-प्रकरण पर प्रश्न किये जाने पर ‘सी० बी० आइ०’ पहुँचा दी जाती है। क्या यह शासकवृन्द का सुकर्त्तव्य है? शासक को तो उदार रहना चाहिए। शासक एक ‘पितु-तुल्य’ है और प्रजा ‘संतान-सम’। सत्तापक्ष से विपक्ष ही तो प्रश्न-प्रतिप्रश्न करता है, जिसका उत्तर-प्रत्युत्तर देना सत्तापक्ष का परम धर्म होता है; क्योंकि उन प्रश्नो मे लोकहित निहित रहता है।
आप समस्त शासन-संचालकों से करबद्ध अनुरोध है कि हमारे भारत राष्ट्र को अपने अवैध कृत्यों से विखण्डित न करें और न ही देशवासियों के मन-प्राण को अपनी भयावह नीतियों और निर्णय से विचलित करें। यह देश किसी ‘समुदाय-विशेष’ का नहीं है और न ही ‘व्यक्ति-विशेष’ का। हम न तो ‘समुदाय-विशेष-समर्थक’ रहे हैं और न ही ‘व्यक्तिपूजक’ रहे हैं, न ही रहेंगे; क्योंकि हम ‘गुणिजन’ के अनुमोदक रहे हैं; वास्तविक ‘राष्ट्रवाद-पोषक’ के साथ रहे हैं। भारतराष्ट्र मे रहनेवाले समस्त देशवासियों को जो भी व्यक्ति अथवा संघटन वा सरकार समदर्शिता के साथ व्यवहार करेगी, हम उसी के साथ रहेंगे। हम अपनी प्रकृति की अभ्यर्थना करते हैं; हम अपने जन्मदात्री-जन्मदाता के प्रति ऋणी हैं तथा अपने समष्टिमूलक संविधान के परिपालक हैं। हमारे लिए इस जगत् का अन्य ‘कोई भी व्यक्ति’ महत्त्वपूर्ण नहीं है; क्योंकि हमने गुणधर्मिता को महत्त्व दिया है, ‘व्यक्तिवादिता’ को कदापि नहीं।
निस्संदेह, आज आप लोग के हाथों मे ‘सत्ता की बाग़डोर’ है; परन्तु इसका अर्थ यह कदापि नहीं कि सत्तासीनजन संविधान की घोर अवहेलना करते हुए, स्वयं को ‘सर्वोपरि’ मान लें। इस देश के किसी भी भूभाग के नागरिक का उतना ही महत्त्व है जितना कि शासन-संचालकों का।
आप यदि यह सोचते हों कि लोग हमारे सुकर्मो का ही गुणगान करें और कुकर्मो का नहीं तो यह कदापि सम्भव नहीं है। हमने यदि किसी दल-विशेष को सत्ता-पक्ष के रूप मे प्रकारान्तर से संवैधानिक मान्यता दी है तो इसका अर्थ यह नहीं है कि वह सत्ताधारी के रूप मे चिरजीवी है। हम देशवासी की सुकोमल भावनाओं के साथ आप लोग यदि अनावश्यक बलप्रयोग करते हैं तो आपको सत्ता मे एक पल भी बने रहने का अधिकार नहीं है। आप लोग को भूलना नहीं चाहिए कि ‘राजसत्ता’ से बढ़कर ‘लोकसत्ता’ होती है। हमने आप लोग को इसलिए सत्ता नहीं सौंपी थी कि देश मे साम्प्रदायिक उन्माद परिव्याप्त करें; अपने दल के सहयोगी संघटनो के माध्यम से एक समुदाय-विशेष के प्रति विष-वपन कराते हुए, देश मे ‘आतंकी’ वातावरण उत्पन्न कर, देश को ‘अराजकता की आग’ मे धकेल दें। आप लोग सैद्धान्तिक “वसुधैव कुटुम्बकम्” के मन्त्र का जाप करते तो हैं; परन्तु सम्पालन नहीं करते। आपकी ‘कर्म’ और ‘कथन’-स्तर पर कितनी दुरभिसंधि है, कृपया दृष्टि-निक्षेपण कर लिया करें।
खेद है! आप लोग अपने कट्टर अनुयायियों की उन्मादी भीड़ लेकर ‘जय श्री राम’ का जिस कठोर और उत्तेजक ध्वनि मे जयघोष करते और कराते हैं, वह ‘रामराज’ का द्योतक नहीं, अपितु ‘रावणराज’ का है। ऐसा प्रतीत होता है, मानो ‘राम’ का प्रतिलिप्यधिकार’ आपलोग ने क्रय कर लिया है और ‘राम’ आप लोग की ही ‘बौद्धिक सम्पदा’ बन चुका है।
“रामराज बैठे त्रैलोका। हर्षित भये गये सब सोका।।” इसे आप लोग बढ़-चढ़कर पढ़ते तो हैं; आपके भक्त भी भजते हैं; परन्तु इस अर्द्धाली के ‘भाव’ ‘अर्थ’ तथा ‘मर्म’ को नहीं समझते। यही कारण है कि हम कल तक जिस पर गर्व करते थे, आज वही ‘खर्व’ (लघु, बौना तथा खण्डित) बन चुका है।
रामराज मे प्रकृति उदारमना थी; सभी सुखमय जीवन व्यतीत करते थे; राजा-प्रजा के मध्य पिता-संतान का सम्बन्ध था; राजा-प्रजा कर्त्तव्यनिष्ठा से ओत-प्रोत थीं; सुखद दाम्पत्य जीवन था; नैतिक बल देखते ही बनता था; सभी तन-मन से बलशाली थे तथा दीर्घजीवी भी।
अब प्रश्न है, इनमे से एक भी वैशिष्ट्य आज भारत मे कहीं भी लक्षित हो पा रहा है?
‘राम’ क्या है? १८ घण्टे तक शासकीय कार्य करने से जब मुक्ति मिले तब इस पर विचार अवश्य कीजिएगा।
(सर्वाधिकार सुरक्षित― आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयाग; २५ अप्रैल, २०२३ ईसवी।)