अवधी लोकगीत परंपरा

सुधान्शु बाजपेयी-


गीत संगीत जीवन का नैसर्गिक स्वभाव है । जीवन के हर भाव को संगीत में हम जीते हैं । महसूस करते हैं । आज गीत का सफर लोकरंग से सिनेमा तक भले ही पहुंच चुका हो भले ही आज हम अपनी भावनाओं को फीलिंग टैग के साथ फेसबुक व्हाट्सएप पर साझा करने लगे हों मगर भावनाओं को अभिव्यक्त करने का माध्यम गीत ही बनते हैं । मगर इन सबसे पीछे गीतों की उस दुनियाँ में जहाँ गीत ही नहीं, सब कुछ साझा था । ऐसे में लोकगीत वो खिड़की हैं जहाँ से आपको पता ही नहीं चलता कि कब आप उस दुनियाँ में पहुंच गये, जहां साझा सुख, साझा दुःख और साझा जीवन जीने का उत्साह था । लोकगीत लोकजीवन के दस्तावेज की तरह हैं ।

ग्राम्य जीवन अभी भी कुछ हद तक इस साझेपन की विरासत को समेटे हुए है । ऐसे ही साझेपन की विरासत, माटी की महक, रिश्तों का शोंधापन, संस्कारों का उत्साह और लोकजीवन के भाव अनुभाव को जानने के लिए हमने अपने गाँव में अवधी लोकगीत परम्परा को जानने का प्रयास किया । अद्भुत अनुभव था । नयी नवेलियों के लिए ये सब आउटटेडेट था, तो प्रौढाओं की स्मृति में उनके बचपन और यौवन के गीतों की धुंधली सी परत बची थी । नब्बे पार कर चुकी एक दादी माँ के पास उनकी स्मृति के पीले पड़ चुके पन्नों में कुछ अवशेष बचे थे, मगर वो भी परम्पराओं के ऐसे ही कुछ गीतों की कडि़याँ आपके लिए-बच्चे के जन्म से शुरू होकर विवाह तक के लिए लोकगीतों की विशाल श्रेणी है ।-

बच्चे के जन्म पर गाया जाने वाला गीत-

जरा धीरे से रो मेरे लालना

तेरे रोवे में बड़ी आवाज रे ।

एक अन्य गीत –

गाड़ी वाले धीरे हाँक रे

लल्ला मेरा सोवे नाहीं…

छठी पर गाया जाने वाला गीत –

मोरा दिल दरियाउ ओ री

हम अइसो करिबो

एक टका के गेहूँ मंगइबो

तवा चढ़इबो सौ साठि री ।

सबसे ज्यादा वैविध्य विवाह के लोक गीतों में है विवाह की हर रस्म के लिए लोकगीतों की लम्बी श्रृंखला है । देवी पूजन से लेकर विदायी तक, जौनार खेत से लेकर वधू आगमन तक ।

देवी पूजन के समय गाया जाने वाला गीत –

देबी आंगन मोरे आयी, निहुरी के मैं पइया लागूं

काहि देखि देबी मगन भयीं, काहि देखि मुस्कानी ।

विवाह निमंत्रण पर गाया जाने वाला गीत –

भंवरा आज मेरे काज परोजन नेवत दइ आवौ

अरगन न्यौतउ परगन न्यौतउ अउर ननियारौ ।

अवध में सुहाग लेने के लिए धोबिन के यहाँ कन्या को ले जाया जाता है, जहाँ वह सुहाग के अमर होने की कामना करती हैं । सुहाग रस्म के लिए जाते समय गाया जाने वाला सुहागगीत…

हरियाइ सेंदुरा महंग भयो, बाबुल मुंदरी भइ अनमोल रे

यही सेंदुरा के कारण बाबुल छोड़बै हम तुम्हार देश रे ।

मण्डप मड़वा छाने के समय गाया जाने वाला गीत –

चंदन खंभा हरे हरे बंसवा मड़वा छवाइ जी

मड़वा छवाइ कलष धरि सोन के मोतिन चौक पुराइ जी ।

द्वारचार के समय गाया जाने वाला गीत-

बंधो रघुवर के माथे सेहरा, होये मुबारक होये मुबारक

बनाय राम जी को दूल्हा बनी सीता मुबारक होये मुबारक ।

फिर कलेवा के समय का गीत –

राम लखन जब जेवन बैठे

देत सखी सब गारी री

गोरे दशरथ गोरी कौशल्या री

गोरे सब सरदारा जी

रघुवर भरत सब कुटुंब से न्यारे

कैसी सूरत कारी जी ।

कन्यादान के समय गाया जाने वाला गीत –

जलु काँपै जलहरि काँपै

काँपै गंगाजलु पानी

मड़ये मा काँपै बेटी के बाबुल

देत हैं कन्यादान रे ।

उसके बाद बेटी की विदायी का गीत –

तुमतौ कहत बाबा नियरे बियाहिब

ब्याहेउ मोहन देश रे

मोहन देश खबरि नाइ मिलिहै

न कोइ आवै न जाइ रे । 

दूसरी तरफ वर पक्ष की तरफ तिलकोत्सव में गाये जाने वाले गीत-

इक दिन जनक ने औझक देखी

अब सीता भइ हैं संजोग रे ।

धावौ रे नउवा धावौ रे बरिया

सीता के जोगी बरू ढूढै रे ।

फिर बारात जाते समय जौं के खेत में जौनार रस्म निभायी जाती है उस समय का गीत –

कि यहु जलु तेरी मछली ने किंदयेउ

कि तेरी फटी है कगार रे गंगा मैया ।

न यहु जलु मछली ने किंदयो

न मेरी फटी है कगार रे

पोता बियाहन चले रे बाबा

सब मोहरै लुटावत जात रे गंगा मैया ।

बारात जाने के बाद घर में सिर्फ महिलाएं रह जाती हैं ऐसे में वो पुरूषों के वेष में नकटा करती हैं –

सैंया रोटियां न खाये चटनियाँ के बिना ।

सैंया हमका मारे डारइ हो चटनियाँ के बिना ।

इन परम्पराओ के अतिरिक्त सोहर, सरिया, बन्ना-बन्नी आदि के माध्यम से सास, बहू, ननद, भाभी, देवर, देवरानी समेत तमाम रिश्तों के बीच हास-परिहास दिखता है । वहीं फसलों और ऋतुओं के साथ गाये जाने वाले चैती, कजरी, फाग में प्रकृति और मानव जीवन के अन्तर्सबंधों का उल्लास दिखता है ।