बैसवारा में शादी -ब्याह जैसे शुभ अवसरों पर हम परमात्मा, अपने परिवारजनों, रिश्तेदारों और इष्ट मित्रों के अलावा अपने पूर्वजों को भी आमंत्रित करते हैं।
मुझे याद है विवाह के एक सप्ताह पहले से ही वृहद परिवार की महिलाएं रोज शाम को सामूहिक रूप से एकत्रित होकर अपने पूर्वजों को ‘सांझ न्यौता’ के माध्यम से कुछ इस तरह आमंत्रित करती हैं—
“शारदा सिंह हो तुमहू नेवाते,
हौंसिला सिंह हो तुमहू नेवाते।
जोखू सिंह हो तुमहू नेवाते।
गुरुजन हो तुमहू नेवाते,
पितर हो तुमहू नेवाते।
सगरी बिरादरी हो तुम्हू नेवाते,
सगरी संगी-साथी हो तुम्हू नेवाते।
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‘सांझ न्यौता’ की हर पंक्ति में निमंत्रण देने का भाव रहता है। इस से पूरे परिवार और आस-पड़ोस में उल्लास और शुभता का विशेष वातावरण बनता है। “सांझ न्यौता” की परंपरा केवल रस्म नहीं बल्कि पूर्वजों की स्मृति, कृतज्ञता और पारिवारिक एकता का उदाहरण है। परिवार का हर सदस्य, जीवित या दिवंगत, शुभ कार्य का भागीदार बनता है। आह्वान गीत में देवता, गुरुजन, ग्राम देवी-देवता, बिरादरी के सभी हितैषियों को शामिल किया जाता है। यह गीत बैसवारा के गाँवों में पितृसम्मान, वंशबंधुता और समष्टि कल्याण की परंपरा को जीवित रखते हैं। यही कारण है कि ऐसे लोकगीत मात्र गीत नहीं, “जीवन-दर्शन” के वाहक भी हैं।
वस्तुत: सनातन संस्कृति में स्थूल शरीर के अतिरिक्त एक सूक्ष्म शरीर भी स्वीकार किया गया है, जो मृत्यु के बाद भी नष्ट नहीं होता। मान्यता है कि पितर इसी सूक्ष्म शरीर से पूजन और तर्पण को ग्रहण करते हैं। हमारे यहां किसी परिजन की मृत्यु हो जाने पर तीसरे वर्ष उसका श्राद्ध किया जाता है और उसका पिंडदान करके पितरों में मिला दिया जाता है। ऐसी मान्यता है कि ऐसा नहीं करने पर पितरों की आत्मा भटकती रहती है। पिंडदान या श्राद्ध करने के बाद ही पितरों को जलांजलि दी जा सकती है और उन्हें शुभ कार्य में आमंत्रित किया जा सकता है।
सनातन धर्म के अनुसार पितृ पक्ष या महालया पक्ष या श्राद्ध पक्ष के दौरान हमारे पूर्वज पितृ लोक से भूलोक यानि पृथ्वी पर आते हैं। पितृ पक्ष के दौरान किये जाने वाले कर्म विधान संपूर्ण मानवता को समर्पित है। पूर्वजों की स्मृति में दिया गया दान किसी भूखे का पेट भर सकता है। किसी जरूरतमंद की जरूरत बन सकता है। यही पितृपक्ष की सार्थकता है। इन्हीं विशिष्ट कारणों से “सर्वे भवन्तु सुखिन:’ का उद्घोष करने वाली सनातन संस्कृति दुनिया की सबसे विलक्षण संस्कृति है।
सनातन संस्कृति का गुणगान इसको मिटाने का ख्वाब देखने वाले आक्रांता भी अपने दुर्दिन में ही सही लेकिन मानते जरूर हैं। तभी तो किले में अपने कुपुत्र द्वारा कैद शाहजहां, अत्याचारी औरंगजेब को लिखे पत्र में कहता है:-
“ऐ पिसर तू अजब मुसलमानी,
ब पिदरे जिंदा आब तरसानी।
आफरीन बाद हिंदवान सद बार,
मैं देहंद पिदरे मुर्दारावा दायम आब।”
(तू अपने जीवित पिता को पानी के लिए तरसा रहा है। शत-शत बार प्रशंसनीय हैं वे हिंदू, जो अपने मृत पितरों को जलांजलि देते हैं।)
(विनय सिंह बैस)
सनातन धर्म में अगाध श्रद्धा रखने वाले