लोकसंसद में विमर्श : इ०वी०एम० की क्रियाप्रणाली पर जब बार-बार अँगुलियाँ उठ रही हैं तब ‘मतदानपत्र’ की व्यवस्था क्यों नहीं की जाती?

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय-


कवि प्रशान्त मिश्र- महोदय अभी तक खूब रखा । जब देश को गाली व भारत माँ को लोग गाली देते हैं, तब आप जैसे लोग कुछ नहीं कहते ।

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय- ऐसे में जो सन्देह की स्थिति बनी है, उसे दूर करने में कैसी हिचक?

कवि प्रशान्त मिश्र- मतदान पत्र की व्यवस्था क्यों लाई जाये । इसमें क्या दिक्कत है वो बताइये पहले मुद्दा तो बताइये ।

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय- भारत माता को जो गाली देता है, उसे सटीक जवाब देता हूँ। मतदानपत्र की व्यवस्था क्यों नहीं?

कवि प्रशान्त मिश्र- पिछली पोस्ट में सरकार को निकम्मी कहा ।

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय- बिलकुल निकम्मी है। जनसामान्य को महँगाई की आग में क्यों झोंका जा रहा है? इसके प्रति सरकार की क्या चिन्ता है? बेरोज़गारी क्यों बढ़ती जा रही है?

जगन्नाथ शुक्ल– प्रशांत जी! यदि सरकार को निकम्मेपन पर कुछ न कहा जाए तो क्या हिन्दी और हिन्दुस्तान की गरिमा बनी रहेगी ?

कवि प्रशान्त मिश्र– अपनी बात कहने का लहजा व सलीका तो हमें देखना चाहिए । बात सरकार को कहने की नही है बंधु ।

जगन्नाथ शुक्ल प्रशान्त जी! उस बात में कोई अपमान नहीं था, मात्र क्रोध प्रस्फुटित हो रहा था न कि लालू पुत्र की तरह स्वागत गीत।

कवि प्रशान्त मिश्र- आपकी समझ को प्रणाम ।

जगन्नाथ शुक्ल- नज़र नज़र की बात है..आप मेरी बात नहीं समझना चाहते और मैं आपकी…वापस आपके अद्भुत सोच को प्रणाम।

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय- कवि प्रशान्त जी! लहजा और सलीक़ा पर अँगुली उठाने से पहले ‘सलीक़ेमन्द’ होना चाहिए। सबसे ऊपर आपने अँगुलियाँ उठाने वालों को ‘बेवकूफ़’ कहा है; किस आधार पर? शुक्ल जी! कवि प्रशान्त जी कुछ विचारों को थोपना चाहते हैं, जो कि यहाँ सम्भव ही नहीं है क्योंकि हमारे विचार “कहीं न बँधते, मुक्त विचरते।” कोई भी सरकार समदर्शी होकर लोकहित में काम करेगी और उसका सकारात्मक प्रभाव दिखेगा तो उसकी सराहना होगी; नहीं दिखेगा तो निन्दा होगी।

कवि प्रशान्त मिश्र– आप तर्क पर बहस करें । आप तो कुतर्क करने लगे इस पर मैं बहस नहीं करना चाहता।

जगन्नाथ शुक्ल- प्रशान्त जी सुप्रभात्! मित्र! पहले तो आप अपने ही विचारों को सम्पोषित करते हो ततपश्चात् आप उन्हें स्वयं ही मुक्त पटल पर पसन्द भी करते हो और साथ ही आप हमें ही नसीहत दे रहे हो। जब तर्क मनोनुकूल न लगे तो उसे कुतर्क की संज्ञा देना बहुत ही आसान होता है।

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय- कवि प्रशान्त जी! तार्किक बनने से पहले ‘विषय-केन्द्रित’ संवाद करने की सामर्थ्य अर्जित कीजिए।

जगन्नाथ शुक्ल- मैं भाजपा, कांग्रेस,सपा, बसपा का गुलाम नहीं हूँ..दिन-रात की तपस्या से ईश्वर ने मुझे सोचने विचारने के लिए मस्तिष्क दिया है। जो लोग डिजिटल इण्डिया के हिमायती हैं क्या वह पत्र सम्प्रेषण की ओर लौट जाएँगे? जब आप ईवीएम को अफ़गानिस्तान भेजते हो तो अपनी सहृदयता के लिए पीठ ठोंकते हो और जब चुनाव में परास्त होते हो तो मशीन में गड़बड़ी की मिथ्या प्रवंचना, सभी लोग मिलकर गड़बड़ी साबित करें न कि हड़बड़ी दिखाएँ।

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय- जगन्नाथ शुक्ल जी! ‘डिजिटल’ प्रौद्यौगिकी से ‘पत्र-संस्कृति’, लेखन-अभ्यास तथा सुलेखन का क्षरण हुआ है। ‘डिजिटल’ प्रौद्योगिकी जब नहीं थी तब हमारी लिपि समृद्धतर थी; हमारी लेखन-क्षमता विस्तीर्ण थी, जो अब संकुचित हो चुकी है। मिथ्या हो अथवा सत्य हो, गड़बड़ी की बातें आ रही हैं तो उनका परिष्कार करना होगा।

जगन्नाथ शुक्ल- जी गुरुदेव निस्संदेह जो भी समस्या आ रही है उसका परिष्कार होना चाहिए ।

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय– शुक्ल जी! समस्या का निराकरण होता है।

रवीन्द्र पाण्डेय- केंद्र सरकार को इसपर गंभीरता से विचार कर उचित निर्णय लेना समीचीन होगा।

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय- जी हाँ, आपका कथन स्वागत-योग्य है। यह भी सत्य है कि वैद्युत यन्त्रों और उपकरणों के साथ प्रौद्योगीकीविशेषज्ञ आसानी से छेड़ख़ानी करते हुए, मनचाहा परिणाम पा सकते हैं।

कुसुम शुक्ला- जहाँ-जहाँ चुनाव में मतपत्र का प्रयोग हुआ है वहाँ की तस्वीर कुछ और कह रही है।

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय– यह तो परीक्षण का विषय है।

देवेश पाण्डेय सर हम चुनाव करवाने जाते हैं और हम जानते हैं कि इविएम् में कोई गड़बड़ी नहीं होती है | पहले तो गड़बड़ी होगा तो निर्वाचन अधिकारी लेंगे ही नहीं | फिर राजनीतिक दल के एजेंटो को चेक कर के दिखाना पड़ता है कि मशीन ठीक से काम कर रही है | तभी चुनाव शुरू करने देते हैं | मत पेटी बदलना आसन है इविएम् नही बदला जा सकता है | सबका न. होता है |

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय– पाण्डेय जी! समाचार-चैनलों पर इ०वी०एम० का एक बटन दबाया गया था तब एक निर्दलीय और एक कमल के फूल की बत्ती एक साथ जली थी। ऐसा कैसे हो गया? एक व्यक्ति बहुत देर तक बटन दबाये हुए था, जिसमें एक बत्ती कमल के फूल और एक हाथी की जल रही थी। ऐसा कैसे हो गया? गुजरात में मशीन का परीक्षण किया गया था तब जो भी बटन दबाया जाता था तब वह कमल के फूल के पक्ष में जाता था फिर मशीनों को बंगलुरु भेजा गया था, जिसे राज्य चुनाव आयुक्त ने स्वीकार भी किया था। हम-आप मशीन के प्रौद्यौगिकी पक्ष को नहीं समझ सकते। इन बिन्दुओं पर आप क्या सोचते हैं?

देवेश पाण्डेय- सर हमने अपना अनुभव लिखा है |

राकेश कुमार पाण्डेय- महानुभाव आपको जानना चाहिए कि मतदान शुरू होने के पूर्व मॉकपोल होता है ,जिसमे evm ठीक से काम कर रहा है या नहीं इसे सभी दल के प्रतिनिधियों को सबके ऊपर मत डाल कर दिखाया जाता है,फिर जब सही होता है तो मतदान प्रारम्भ होता है।चुनाव-आयोग सभी दलों को evm चुनौती देने के लिए बुलाया कोई चुनौती नहीं दे पाया।सबसे पहले आप यानी विद्वान पांडेय जी सभी तथ्यों को समझने का प्रयत्न करिए और चुनाव -आयोग पर विश्वास रखिए,वरना आपके जैसे बुद्धिजीवी जब अंध संदेही हो जाएगा ,तब तो ‘संशयात्मा विनश्यति’।

अरविन्द कुमार मौर्य- मत पत्र की कमियों को दूर करते हुए ईवीएम तक आए है ।

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय– मौर्य जी! आप उसे पूर्णत: विश्वसनीय मानते हैं?

देवेन्द्र कुमार तिवारी- सभी सम्मानित सदस्यों का अभिवादन! इतना शोर क्यों? दरअसल में गड़बड़ी कुछेक लोगों के दिमाग में हैं,और कुछ जो मतपत्र पेटियों को कब्जा कर लिया करते थे अब जो उनको मौका मिल नहीं रहा है। सबसे ज्यादा समस्या उन्हें ही हो रहीं हैं। जनमत तो किसी भी आधार /प्रकार से किया जा सकता है। लोग कहते भले कुछ रहें , निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए ।सदैव पक्ष/विपक्ष दोनों परिस्थितियों को बिगाड़ने में आगे रहते हैं।

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय- शोर यों ही नहीं होता। कोई दल ईमानदार नहीं है; अवसर मिलना चाहिए।

देवेन्द्र कुमार तिवारी- आज कोई वारदात क्यों नहीं होती कि कहीं से ईवीएम मशीन किसी दल या विशेष के द्वारा अपह्रत की गई। इससे पूर्व हमने प्रत्येक चुनाव के दौरान देखा/सुना होगा कि फलां जगह, फलां मतदान केन्द्र पर फलां-फलां द्वारा मतपत्रों को अधिगृहीत किया गया । अब लोगों को यह करने में आसान नहीं है। शायद इसीलिए भी ईवीएम मशीन का विरोध किया जा रहा है।

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय– पद्धति कोई भी अपनायी जाये, आरोप होते रहेंगे। आरोप का स्वर तीव्र होने लगे तब उसका परीक्षण कर लेना चाहिए। ऐसे में, जिन दलों के प्रमुख गड़बड़ी का आरोप लगा रहे हैं, वे मुखर होकर सामने क्यों नहीं आ रहे हैं? उन्हीं की निष्क्रियता के कारण जनता तक ग़लत सन्देश जा रहा है। यदि आरोप ग़लत है तो निस्सन्देह यह बहुत बड़ा अपराध है।

देवेन्द्र कुमार तिवारी- आचार्य! शीर्षस्थ ही अपने छुटभैय्ए द्वारा समाज को बरगलाने का कार्य करवाते हैं और स्वयं दूध के धुले रहते हैं। अपराध जघन्य है

राकेश कुमार पाण्डेय- जो लोग चुनाव कराते हैं,वे भली-भाँति जानते हैं कि EVM में कोई गड़बड़ी नहीं है, वरन उस पर प्रश्न उठाने वाले हीन भावना से ग्रस्त हैं और थेथर हैं।

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय- फिर उन लोगों की शंका का समाधान कैसे हो?

राकेश कुमार पाण्डेय- संशोधन के लिए धन्यवाद।समाधान के लिए जब चुनाव-आयोग बुलाया था,तब जाना चाहिए था।वहाँ पहुँच कर वे लोग अपना पक्ष रखते।

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय- उन्हें गम्भीर तथ्यों के साथ स्वयं को प्रस्तुत करना होगा, अन्यथा वे ‘इ०वी०एम० में गड़बड़ी’ का आरोप करना बन्द करें।

अभिलाष नारायण- लोगों ने तो पृथ्वी गोल है, मानने से भी मना कर दिया था, तो क्या उसे चपटी मान लिया जाए ।

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय- यह तो आपके ‘विवेक’ पर निर्भर करता है। देवेश पाण्डेय जी ! मैं आपके अनुभव को असत्य नहीं ठहरा रहा हूँ। जिस तरह के प्रमाण जिस रूप में दिखाये जाते हैं, उनका विवरण प्रस्तुत कर रहा हूँ। ऐसे मे, आप और राकेश कुमार पाण्डेय जी की टिप्पणी से लगता है कि इ०वी०एम० की क्रिया-प्रणाली को अनावश्यक रूप में संशय की स्थिति में लाया जा रहा है।

गिरिराज किशोर- व्यवसाय में अपना लाभ देखा जाता है।

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय- यह तो बाज़ार का प्रथम नियम है।