क्या रखा है होशियारी में  

जगन्नाथ शुक्ल, इलाहाबाद

चाहे गुरु पर्व कहो लोहड़ी या फिर मकर संक्रान्ति,

सूर्य देव ओट में हैं कुहासा ने मचा रखा है क्रान्ति!
राष्ट्रभक्त और विद्वत्जन लोभवश सब हैं चुप बैठे,
देखो चोर उचक्के नेता सब मचा रखे हैं भ्रान्ति !!
जिसको देखो हड्डी चाहे न मिलने पे पीटे छाती ,
स्वार्थ्य में अन्धे कवि भी देखो भेज रहे हैं पाती!
कोई अपना तमगा लौटाए, कोई लौटाए पुरस्कार,
राष्ट्र का मुँह काला कर खुद की छवि है भाती!!
राजनीति रणनीति में बदली,मन में कुत्सित माया,
ऐसे कुत्सित राष्ट्रप्रेम से राष्ट्र में है संकट गहराया!
शिक्षित युवा घूम रहे ,सड़कों पर ही ढूँढ़ें रोजगार,
निकल गईं बन्दूकें , अब उसका सिर है चकराया!!
न्याय नहीं अन्याय पल रहा  बन्द चारदीवारी में,
पेट पालने को ही न है क्या करे गरीब बीमारी में!
थोड़ा सा कुछ शर्म करो,करो राजधर्म का पालन,
देश तुम्हारा लोग तुम्हारे ,क्या रखा है होशियारी में!!
कल कल निनादिनी गङ्गा में राजनीति भी गरमाई,
उसकी हालत देख देख के शर्म किसी को न आई!
नेह गेह की रीति हमारी,उच्च आदर्शों के रखवाले,
केवल हम एक दूजे की ,क्यों नाप रहे हैं गहराई!!