हम एक के बदले दस सिर नहीं शांति चाहते हैं : सुधांशु बाजपेयी

सैनिकों की शहादत सिर्फ एक सैनिक के रूप में नहीं बल्कि किसी पत्नी के लिए अपना सर्वस्व खो देने, माता-पिता के लिए जिंदगी का सहारा खो देने, बच्चों के लिए पिता का प्यार-मजबूती खो देने ,एक परिवार के लिए ताजिंदगी गम ढोने के रूप में मुझे ज्यादा दुःखदायी है, जो दुःख सीमा के दोनो ही पार एक ही जैसा है।

अजीब सी पीङा महसूस होती है, हम एक के बदले दस सिर नहीं शांति चाहते हैं, ऐसे में मैं दीवाली नहीं मना रहा , पटाखे तो सालों से नहीं फोङते , सिर्फ त्यौहार के बहाने पुराने मित्रों से मेल मिलाप कर लेते हैं । आप भी सादगी से मनाइये, रवाइश बंद करिये, हो सके तो अधिकतम मिट्टी के दिये जलाइये ।