‘धर्म’ और ‘मज़हब’ के दो विद्रूप चेहरे

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय


सृष्टि का जो अंश पल रहा है तुम्हारी कोख में
उसे न तो ‘राम’ की माला पहनाना
और न बाँधना ‘रहीम’ की ताबीज़।
उसे रहने देना सिर्फ़ उस इंसान की सन्तान,
जिसका न कोई ‘धर्म’ है और न कोई ‘मज़हब’।
अपनी सन्तान को न किसी ‘मस्जिद’ की ओर रुख़ होने देना
और न किसी ‘मन्दिर’ की ओर।
न तो चस्पा होने देना उस पर किसी ‘वाहे गुरु’ का शब्द
और न तो उसके गले में लटकने देना
किसी ‘क्रॉस’ का फन्दा।
उसे जीवन का मर्म समझाना
और देना इंसानियत की सीख।
जानती हो न !
‘प्रार्थना’ और ‘अज़ान’ के यही ठीकेदार
हमें डाल आये थे :—
दो ऐसी अन्धी सुरंगों में,
जहाँ हर पल मातमी अनुगूँज उठती थी,
मानो कोई जीवन्त क़ब्र बनाते हुए
मर्सिया गा रहा हो।
हम वर्षों तक हाथ-पैर मारते रहे
तभी :—
हम तक छन कर पहुँची थीं
नूर की लकीरें
और तब भस्मीभूत हआ था :—
‘धर्म’ और ‘मज़हब’ का
बीभत्स चेहरा !
(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, इलाहाबाद; २३ जुलाई, २०१८ ईसवी)