व्यंग्यात्मक ग़ज़ल – भूल चूक मुआफ़

डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’


हमारे प्रिय नेताजी छीन-झपट कर बैठे

न सुधरे जनता से छल-कपट कर बैठे ।

सड़कें ख़राब थी बिजली भी नहीं आती

हम बिजली के बटन चट-पट कर बैठे ।

दिमाग़ आज हमारा बहुत ख़राब हुआ

घर पर हम पत्नी से खट-पट कर बैठे ।

अब बदला लेने की ठान ली थी इसलिए

बाक़ी सारा काम ख़त्म झट-पट कर बैठे ।

जैसे ही रास्ते में मिले हमारे प्रिय नेताजी

टकले पे ‘राहत’ चप्पल पटा-पट कर बैठे ।