विचारणीय विषय : छन्द-विधान पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय


‘छन्द-विधान’ पर अब नये सिरे से विचार करने की आवश्यकता है; क्योंकि कवि-कवयित्रियाँ ‘वर्तनी-अशुद्धि’ को प्रश्रय देते हुए, स्वेच्छाचारिता का परिचय देती आ रही हैं। अधिकतर सर्जक अपनी सुविधानुसार ‘लघु’ और ‘दीर्घ’ बना लेते हैं।

जैसे — दिख का ‘दीख’, साधु का ‘साधू’, महसूस किया को ‘महसूसा’, स्वीकार करना को ‘स्वीकारा’, विनाश किया को ‘बिनाशा’ अर्थ को ‘अरथ’, शब्द को ‘शबद’, छठी को ‘छठीं’/’छठवीं’ का प्रयोग हमारी कवि-कवयित्रियाँ ‘बलप्रयोगधर्मिता’ का परिचय देते हुए करती आ रही हैं। इस तरह के शताधिक शब्द हैं, जिनका अशुद्ध प्रयोग किया जा रहा है।

दो शब्द हैं :—
‘तुम्हीं’ और ‘हमीं’।

छन्द के जानकार दोनों में समान मात्रा का होना मानते हैं। इसी प्रकार की अन्य विसंगतियाँ लक्षित होती आ रही हैं, जिन पर दृष्टि-निक्षेपण करना और संवाद-प्रश्न-प्रतिप्रश्न करना अब अपरिहार्य हो गया है।

यहाँ प्रश्न है, दोहा आदिक में मात्र उपयुक्त मात्राएँ लगी हों; किन्तु वर्तनी-दोष हो तो क्या उस दोहादिक को छन्द के जानकार उपयुक्त मानेंगे।

उल्लेखनीय है कि छन्द का कोई ‘स्वतन्त्र’ व्याकरण नहीं है। हाँ, छन्द का अपना ‘विधान’ अवश्य है। उसके बाद भी किसी भी छन्द की रचना करते समय उस परिवेश में प्रयुक्त शब्दों को व्याकरण की कसौटी पर कसना अनिवार्य हो जाता है; अन्यथा शब्द-समीक्षक समीक्ष्य रचना को स्वीकार नहीं करेगा, भले ही वह अति मनोहर ‘छन्द’ क्यों न हो।

(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, इलाहाबाद; ८ अक्तूबर, २०१८ ईसवी)