जगन्नाथ शुक्ल…✍ (प्रयागराज)-
जिसने अपनी रचनाओं में , हर कालखण्ड को खींचा है;
जिसके कलम की स्याही ने ,नित सूर्य-चन्द्र को सींचा है।
जो दिनकर-कबीर के वंशज हैं, हर ग़लत बात पे प्रश्न किये;
जब लगता जनध्वनि मन्द हुई,आगे आ मुट्ठी भींचा है।।
जब राजवंश के पहरे थे, तब नहीं किसी से डरते थे;
मुगलों-तुर्कों का था जब शासन,तब भी नहीं ठहरते थे।
इस लोकतन्त्र के शासन में , जाने सब क्यों हैं मौन हुये;
उठते-गिरते हर प्रश्न आज, मन के अन्दर ही गौण हुये।
जड़ को दीमक नित चाट रहा, भ्रम होता हरा बगीचा है।
अब प्रश्नबाण असहाय हुये, पद – पुरस्कार की आशा में;
खुद के विचार को कुन्द किये, अभिषेकों की अभिलाषा में।
जिनको बनना जनवाणी था, धनवाणी बनना स्वीकार किये;
साहित्य आज संघर्षित है, लालच वश सबने व्यभिचार किये।
कविधर्म आज क्षत-विक्षत है, क्यों हुआ आज सर नीचा है?
हर युग में कवि और कविता थी, और मदपूरित मधुशाला भी;
चारण कवि भी थे हुए कभी, और प्रश्न पूँछते भाला भी।
बहती थी प्रेम की सरिता भी, और व्यंग्यबाण की बौछारें;
भक्तिभाव की जपमाला, और बरसते ओज के अंगारे।
प्रस्तुत हर उपल-विषम पल की, कवि ने की सदा समीक्षा है।
तुम करो राजधर्म का पालन, कवि को कविधर्म निभाने दो;
लोकगीत का जी कर जीवन, कवि को जन-गण-मन गाने दो।
खेतों में चलते हल की भाषा,कल-कल नदिया की सुनाने दो;
बैठे आस्तीन में साँपों का, कवि को विष अभी बुझाने दो।
कठिन वक्त के जटिल प्रश्न, हल करना यही परीक्षा है।