ग़ज़ल : बन्द कर चोंच को चहचहा तक न पाये

जगन्नाथ शुक्ल…✍
(प्रयागराज)

इश्क़  के   शह्र   से , हो  रिहा  तक न पाये।
साँस  से साँस  को हम तहा  तक  न पाये।।

इस   क़दर  अश्क़   से    है  मोहब्बत   हुई;
दिल सिसकता रहा और बहा तक न पाये।

बह  न   जायें  कहीं  अज़नबी  की  तरह;
गर्म  बढ़ती  गई और नहा  तक  न पाये।

रेत  है    बन    गई   ज़िन्दगी इस क़दर;
नीर आँखों में था लहलहा तक न पाये।

टीस  उठती  रही  मन  की  देहरी तलक़ ;
अधखिले पुष्प-सा कहकहा तक न पाये।

हृदय  मासूमियत  से  भरा  रह गया ‘जगन’- 
बन्द  कर  चोंच  को  चहचहा  तक न पाये।