जगन्नाथ शुक्ल…✍
(प्रयागराज)
इश्क़ के शह्र से , हो रिहा तक न पाये।
साँस से साँस को हम तहा तक न पाये।।
इस क़दर अश्क़ से है मोहब्बत हुई;
दिल सिसकता रहा और बहा तक न पाये।
बह न जायें कहीं अज़नबी की तरह;
गर्म बढ़ती गई और नहा तक न पाये।
रेत है बन गई ज़िन्दगी इस क़दर;
नीर आँखों में था लहलहा तक न पाये।
टीस उठती रही मन की देहरी तलक़ ;
अधखिले पुष्प-सा कहकहा तक न पाये।
हृदय मासूमियत से भरा रह गया ‘जगन’-
बन्द कर चोंच को चहचहा तक न पाये।